पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में चुनाव ड्यूटी के दौरान सात न्यायिक अधिकारियों (जजों) को बंधक बनाए जाने के मामले ने अब राष्ट्रीय स्तर पर तूल पकड़ लिया है। देश की शीर्ष अदालत, सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख और निर्देश के बाद, चुनाव आयोग ने इस संवेदनशील मामले की जांच राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA) को सौंप दी है। कोर्ट ने इस घटना को न केवल कानून-व्यवस्था की चरमराती स्थिति बताया, बल्कि इसे न्यायपालिका को डराने की एक सुनियोजित साजिश भी करार दिया है।
यह पूरी घटना मालदा जिले के कालियाचक इलाके में तब शुरू हुई, जब मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के दौरान सात न्यायिक अधिकारी अपना काम कर रहे थे। बुधवार दोपहर करीब साढ़े तीन बजे असामाजिक तत्वों की एक भीड़ ने खंड विकास अधिकारी (BDO) कार्यालय को चारों तरफ से घेर लिया। इन अधिकारियों को घंटों तक बंधक बनाए रखा गया और प्रशासन की ओर से समय पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई, जिससे स्थिति और अधिक तनावपूर्ण हो गई।
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपनी सुनवाई के दौरान पश्चिम बंगाल सरकार और स्थानीय प्रशासन को जमकर फटकार लगाई। शीर्ष न्यायालय ने कहा कि यह घटना राज्य प्रशासन की पूर्ण विफलता को उजागर करती है। कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए पश्चिम बंगाल को “सबसे अधिक ध्रुवीकरण वाला राज्य” बताया और इस बात पर गहरी नाराजगी जताई कि न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में स्थानीय तंत्र पूरी तरह विफल रहा।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि न्यायिक अधिकारियों का घेराव करना न केवल उन्हें डराने का एक बेशर्म प्रयास था, बल्कि यह सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को चुनौती देने के बराबर था। इसी नाराजगी के बाद कोर्ट ने जांच को सीबीआई (CBI) या एनआईए (NIA) को सौंपने का निर्देश दिया था, जिसके अनुपालन में चुनाव आयोग ने दिल्ली से एक पत्र जारी कर एनआईए को इस मामले में तुरंत जांच शुरू करने का आदेश दिया।
इस मामले में पुलिस ने अब तक कुल 17 लोगों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार किए गए लोगों में इंडियन सेकुलर फ्रंट (ISF) के उम्मीदवार मौलाना शाहजहां अली भी शामिल हैं। पुलिस ने इन सभी आरोपियों को जिला अदालत में पेश किया, जहाँ से उन्हें 10 दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया गया है। एनआईए की एक विशेष टीम शुक्रवार को मालदा पहुंचकर मामले की कमान संभाल रही है, ताकि पर्दे के पीछे छिपे असली साजिशकर्ताओं का पता लगाया जा सके।
दूसरी ओर, कोलकाता पुलिस ने भी इस मामले से जुड़ी अन्य गतिविधियों पर बड़ी कार्रवाई की है। कोलकाता के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के कार्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन करने और सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के दो पार्षदों सहित छह लोगों के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई है। पार्षद शांति रंजन कुंडू और सचिन सिंह पर आरोप है कि उन्होंने पुलिस के आदेशों का उल्लंघन करते हुए भीड़ जुटाई और सार्वजनिक यातायात को बाधित किया।
पुलिस की एफआईआर के अनुसार, इन नेताओं ने 31 मार्च और 1 अप्रैल की मध्यरात्रि को शिपिंग कॉर्पोरेशन बिल्डिंग स्थित चुनाव आयोग के दफ्तर के बाहर गैर-कानूनी जमावड़ा बनाया था। आरोप है कि पुलिस द्वारा बार-बार हटने की चेतावनी दिए जाने के बावजूद आरोपियों ने जानबूझकर बात मानने से इनकार कर दिया। इस दौरान न केवल सार्वजनिक आवाजाही रोकी गई, बल्कि चुनाव आयोग के खिलाफ भड़काऊ और डराने वाले नारे भी लगाए गए।
राजनीतिक गलियारों में भी इस घटना के बाद हलचल तेज हो गई है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इस मामले को लेकर विपक्षी नेताओं पर कड़ा प्रहार किया है। उन्होंने राहुल गांधी का नाम लिए बिना कहा कि देश अब किसी की लापरवाही के कारण नुकसान नहीं झेल सकता। रिजिजू ने सरकार की प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा कि अब हर महत्वपूर्ण बिल पास कराया जाएगा और देश की सुरक्षा व न्यायिक मर्यादा से खिलवाड़ करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।
वर्तमान में, मालदा से लेकर कोलकाता तक सुरक्षा एजेंसियां अलर्ट पर हैं। एनआईए द्वारा जांच की जिम्मेदारी संभालने के बाद अब उन “बाहरी तत्वों” और राजनीतिक संबंधों की तलाश की जा रही है, जिन्होंने चुनाव प्रक्रिया में बाधा डालने के लिए न्यायिक अधिकारियों को निशाना बनाया। यह मामला आने वाले दिनों में बंगाल की राजनीति और न्यायिक सुरक्षा के मानकों में बड़े बदलाव का कारण बन सकता है।

