रायपुर: चैत्र नवरात्रि 2026 के साथ ही हिंदू नववर्ष ‘विक्रम संवत’ का भव्य शुभारंभ हो गया है। आज से देश भर के मंदिरों और घरों में मां दुर्गा के नौ रूपों की विशेष पूजा-अर्चना शुरू हो गई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी ने ब्रह्मांड की रचना की थी, इसलिए इस दिन का महत्व आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टि से अत्यंत फलदायी माना जाता है। सुबह से ही श्रद्धालु स्नान-ध्यान कर शक्ति की भक्ति में लीन नजर आ रहे हैं और मंदिरों में ‘जय माता दी’ के जयकारों की गूंज सुनाई दे रही है।
नवरात्रि के प्रथम दिन कलश स्थापना यानी घटस्थापना का विशेष विधान है। शास्त्रों के अनुसार, कलश को संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक माना जाता है। कलश के मुख में भगवान विष्णु, कंठ में रुद्र और मूल में ब्रह्मा का वास होता है। उत्तर-पूर्व दिशा (ईशान कोण) में विधि-विधान से स्थापित यह कलश घर की नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त कर सुख-शांति का संचार करता है। कलश के ऊपर रखा नारियल और आम के पल्लव जीवन में नई उमंग और शीतलता का प्रतीक माने जाते हैं।
पूजा की एक और महत्वपूर्ण परंपरा जौ (ज्वारे) बोने की है। जौ को सृष्टि की पहली फसल माना जाता है, जिसे ‘पूर्ण अन्न’ का दर्जा प्राप्त है। मान्यता है कि मिट्टी के पात्र में बोए गए जौ जिस गति से बढ़ते हैं, वह भविष्य की समृद्धि का संकेत देते हैं। यदि नौ दिनों के भीतर जौ हरे-भरे और घने उगते हैं, तो इसे आने वाले वर्ष के लिए खुशहाली और अच्छी फसल का शुभ संकेत माना जाता है। भक्त पूरी श्रद्धा के साथ इनकी देखभाल करते हैं ताकि माता की कृपा सदैव बनी रहे।
पूजा में अक्षत (बिना टूटे हुए चावल) का प्रयोग भी अनिवार्य है। अक्षत का अर्थ है ‘जिसका क्षय न हो’, जो पूर्णता और अखंडता को दर्शाता है। कलश के नीचे रखे गए चावल मां लक्ष्मी और मां अन्नपूर्णा का आह्वान करते हैं, ताकि साधक के घर में कभी धन-धान्य की कमी न हो। विद्वानों का मानना है कि यदि कलश, जौ और अक्षत का प्रयोग सही विधि और शुद्ध मन से किया जाए, तो साधक की हर मनोकामना पूर्ण होती है और जीवन के कष्टों का निवारण होता है।

