इजरायल की डिफेंस टेक्नोलॉजी ने एक बार फिर दुनिया को चौंका दिया है। हाल ही में सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, इजरायली रक्षा अनुसंधान और वैज्ञानिक संस्थान ऐसे अत्याधुनिक रोबोट्स और माइक्रोड्रोन्स पर तेजी से काम कर रहे हैं, जो दिखने और चलने में बिल्कुल कॉकरोच (तिलचट्टे) जैसे हैं। इस ‘बायो-इंस्पायर्ड’ तकनीक का मुख्य उद्देश्य युद्ध के मैदान में जासूसी और टोह लेने के तरीकों को पूरी तरह से बदलकर रख देना है, जिससे सैनिक बिना किसी प्रत्यक्ष खतरे के दुश्मन की हर चाल पर नजर रख सकें।
वैज्ञानिकों और रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि कॉकरोच जैसे जीवों की शारीरिक बनावट उनकी सबसे बड़ी ताकत होती है। ये कीड़े बेहद तंग जगहों, संकरी दरारों, मलबे के ढेरों और भूमिगत सुरंगों में आसानी से आ-जा सकते हैं। पारंपरिक रोबोट्स या पहिएदार गाड़ियां हर जगह नहीं पहुँच पातीं, लेकिन इस तरह के सूक्ष्म रोबोट्स किसी भी असमान और दुर्गम इलाके में आसानी से रेंगते हुए आगे बढ़ने में पूरी तरह सक्षम होते हैं।
इस अत्याधुनिक तकनीक के पीछे की कार्यप्रणाली बेहद दिलचस्प है। इन रोबोट्स या ‘साइबॉर्ग डिवाइसेज’ में अत्यंत छोटे आकार के इलेक्ट्रॉनिक सेंसर, हाई-डेफिनिशन माइक्रो कैमरे, ऑडियो ट्रांसमीटर और जीपीएस मॉड्यूल जोड़े जाते हैं। इन्हें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और रिमोट सिग्नल के जरिए दूर बैठे कंट्रोल रूम से संचालित किया जाता है, जिससे यह दुश्मनों की नजरों से बचकर खुफिया जानकारियां जुटाते रहते हैं।
विशेष तौर पर इजराइल जैसे देशों के लिए यह तकनीक सामरिक रूप से बेहद अहम साबित हो रही है। गाजा या अन्य शहरी युद्ध क्षेत्रों में आतंकवादियों द्वारा बनाए गए सुरंगों के विशाल नेटवर्क और खंडहरों में छिपे ठिकानों का पता लगाना पारंपरिक सेनाओं के लिए एक बड़ी चुनौती रहा है। ऐसे खतरनाक और जटिल इलाकों में इन कॉकरोच रोबोट्स को आगे भेजकर दुश्मन की सटीक स्थिति और हथियारों के जखीरे का आसानी से पता लगाया जा सकता है।
इस तकनीक का सबसे बड़ा लाभ अग्रिम मोर्चे पर तैनात सैनिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। अब तक किसी भी इमारत या संदिग्ध ठिकाने के अंदर झांकने के लिए जवानों को अपनी जान जोखिम में डालकर आगे बढ़ना पड़ता था, जिससे भारी नुकसान की आशंका बनी रहती थी। इन रोबोटिक स्काउट्स के इस्तेमाल से बिना किसी इंसानी नुकसान के दुश्मन के ठिकानों की लाइव वीडियो फीड और अंदरूनी नक्शा कमांड सेंटर को मिल जाता है।
रक्षा क्षेत्र के जानकारों का यह भी कहना है कि भविष्य में ‘स्वार्म टेक्नोलॉजी’ (झुंड तकनीक) के जरिए ऐसे हजारों माइक्रोरोबोट्स को एक साथ युद्धक्षेत्र में छोड़ा जा सकेगा। जब बड़ी संख्या में ये छोटे रोबोट्स एक साथ मिलकर काम करेंगे, तो वे एक मजबूत और impenetrable (अदृश्य) सर्विलांस नेटवर्क तैयार कर देंगे, जिसे भेदना दुश्मन के लिए असंभव होगा।
सैन्य जासूसी और युद्ध रणनीतियों के अलावा, इस तकनीक के शांतिपूर्ण और मानवीय उपयोग भी बहुत व्यापक हैं। भूकंप, भूस्खलन या अन्य प्राकृतिक आपदाओं के दौरान ढह चुकी इमारतों के मलबे में दबे हुए जीवित लोगों की तलाश करने में ये रोबोट जीवनरक्षक साबित हो सकते हैं। कुल मिलाकर, यह तकनीक इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भविष्य के युद्ध केवल बड़े हथियारों से नहीं, बल्कि अत्यधिक सूक्ष्म और स्मार्ट मशीनों द्वारा लड़े जाएंगे।

