विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिका के न्यूयॉर्क में ‘एशिया सोसाइटी’ के एक विशेष कार्यक्रम को संबोधित करते हुए दुनिया को एक गंभीर भू-राजनीतिक और आर्थिक चेतावनी दी है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि यूक्रेन और ईरान-खाड़ी (Gulf) क्षेत्र में जारी संघर्षों पर जल्द लगाम नहीं लगाई गई, तो आने वाले समय में दुनिया भर में एक विकट वैश्विक खाद्य संकट उत्पन्न हो सकता है, जिससे सबसे अधिक प्रभावित विकासशील देश होंगे।
जयशंकर ने विस्तार से बताया कि इन युद्धों के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह चरमरा गई है। विशेष तौर पर काला सागर (Black Sea) क्षेत्र से होने वाले खाद्यान्न और अनाज का निर्यात बाधित हुआ है, जो दुनिया के कई हिस्सों में भोजन की आपूर्ति का मुख्य मार्ग है। इसके अलावा, दुनिया के प्रमुख उर्वरक उत्पादक देश भी सीधे तौर पर इन संकटों की चपेट में हैं, जिससे कृषि के लिए जरूरी खाद की वैश्विक स्तर पर भारी किल्लत हो गई है।
अपने संबोधन में विदेश मंत्री ने ‘4F’ संकट यानी फूड (Food), फ्यूल (Fuel), फर्टिलाइज़र (Fertilizer) और फाइनेंस (Finance) का जिक्र करते हुए कहा कि ये चारों तत्व एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। ऊर्जा की बढ़ती कीमतें, खाद्यान्न की कमी, खाद के दाम में उछाल और वित्तीय अस्थिरता मिलकर ग्लोबल साउथ की अर्थव्यवस्थाओं की कमर तोड़ रहे हैं। विकासशील देशों के लिए अपने नागरिकों को सस्ती दरों पर भोजन और ईंधन मुहैया कराना दिन-प्रतिदिन कठिन होता जा रहा है।
वैश्विक संघर्षों के कारण पूंजी के पलायन पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि अनिश्चितता के इस दौर में निवेशक सुरक्षित निवेश की तलाश करते हैं। इसके परिणामस्वरूप, विकासशील और गरीब देशों के बाजारों से पूंजी निकलकर सुरक्षित माने जाने वाले विकसित बाजारों की ओर रुख कर रही है। इससे इन देशों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ता है और विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से घटता है, जिससे वे जरूरी सामानों का आयात करने में भी असमर्थ हो जाते हैं।
विदेश मंत्री ने इतिहास का हवाला देते हुए याद दिलाया कि कैसे यूक्रेन युद्ध के शुरुआती चरणों के बाद कई देशों में गंभीर राजनीतिक अस्थिरता और जन-आक्रोश देखने को मिला था। यदि पश्चिम एशिया और खाड़ी क्षेत्र का मौजूदा संघर्ष और लंबा खिंचता है, तो इसके झटके केवल क्षेत्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि दुनिया के अन्य हिस्सों में भी राजनीतिक और सामाजिक अशांति को जन्म दे सकते हैं।
इस जटिल परिस्थिति में जलवायु परिवर्तन और ‘सुपर अल नीनो’ जैसी प्राकृतिक आपदाओं ने स्थिति को और अधिक भयावह बना दिया है। एक तरफ जहां मानसूनी अनिश्चितताएं और चरम मौसमी घटनाएं कृषि उत्पादन को पहले ही कमजोर कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ युद्धजनित बाधाएं खाद्य सुरक्षा के बचे-खुले तंत्र को भी नष्ट कर रही हैं। यह ‘कोड़े पर खाज’ जैसी स्थिति बन चुकी है।
जयशंकर ने दुनिया के संपन्न और शक्तिशाली राष्ट्रों को कड़ा संदेश देते हुए कहा कि मौजूदा दौर में अत्यधिक स्वार्थी या आत्म-केंद्रित नीतियां अपनाने से काम नहीं चलेगा। बड़े और ताकतवर देशों को यह समझना होगा कि उनके भू-राजनीतिक फैसले और व्यापारिक प्रतिबंध दूर-दराज के संसाधन-हीन देशों की बुनियादी आजीविका को सीधे तौर पर प्रभावित करते हैं।
अंत में, विदेश मंत्री ने वैश्विक समुदाय से कूटनीतिक संवाद और शांति के रास्ते पर लौटने की जोरदार अपील की। उन्होंने कहा कि दुनिया के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए बहुपक्षीय सहयोग, आपूर्ति श्रृंखलाओं की बहाली और विशेषकर विकासशील देशों की संवेदनशीलता को प्राथमिकता देना आज की सबसे बड़ी अनिवार्यता है, अन्यथा पूरी मानव जाति को इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।

