मदुरै: तमिलनाडु के बहुचर्चित सथानकुलम हिरासत मौत मामले में मदुरै की एक विशेष अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 9 पुलिसकर्मियों को मौत की सजा दी है। सोमवार को मदुरै फर्स्ट एडिशनल डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के जज जी. मुथुकुमार ने इंस्पेक्टर श्रीधर समेत सभी आरोपियों को पी. जयराज और उनके बेटे जे. बेनिक्स की बेरहमी से हत्या करने का दोषी पाया। अदालत ने इस घटना को ‘दुर्लभतम से दुर्लभ’ श्रेणी में रखते हुए टिप्पणी की कि वर्दी पहनने वालों द्वारा किया गया यह कृत्य मानवता पर कलंक है।
यह मामला जून 2020 का है, जब पूरा देश कोरोना लॉकडाउन की पाबंदियों से जूझ रहा था। थूथुकुडी जिले के सथानकुलम में मोबाइल कारोबारी पी. जयराज और उनके बेटे बेनिक्स को पुलिस ने सिर्फ इसलिए हिरासत में लिया था क्योंकि उन्होंने कथित तौर पर तय समय के बाद भी अपनी दुकान खुली रखी थी। लेकिन यह मामूली कानूनी कार्रवाई चंद घंटों में एक वीभत्स हत्याकांड में बदल गई। पुलिस स्टेशन ले जाए जाने के बाद दोनों के साथ उस रात जो हुआ, उसने पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया था।

जांच के दौरान जो तथ्य सामने आए, वे दिल दहला देने वाले थे। सीबीआई (CBI) ने अदालत को बताया कि जयराज और बेनिक्स को थाने में पूरी रात बर्बर तरीके से टॉर्चर किया गया। उनके शरीर पर गंभीर चोटों के निशान थे और अत्यधिक खून बहने के बावजूद उन्हें समय पर इलाज नहीं दिया गया। न्यायिक हिरासत में भेजे जाने के कुछ ही दिनों के भीतर, 22 और 23 जून को अस्पताल में दोनों ने दम तोड़ दिया। परिजनों का आरोप था कि पुलिस ने उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया और निजी अंगों पर भी हमला किया था।
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब सथानकुलम थाने की ही एक महिला कांस्टेबल ने गवाही दी। उन्होंने निडर होकर अदालत को बताया कि उस रात थाने में पिता-पुत्र को कितनी बेरहमी से पीटा गया था। कांस्टेबल की गवाही ने पुलिस के उन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया कि दोनों की मौत सामान्य परिस्थितियों में हुई थी। हालांकि पुलिस ने साक्ष्य मिटाने के लिए सीसीटीवी (CCTV) फुटेज को सुरक्षित नहीं रखा था, लेकिन फॉरेंसिक रिपोर्ट और खून से सनी लाठियों ने आरोपियों के खिलाफ पुख्ता सबूत पेश किए।
अदालत ने अपने फैसले में मुख्य आरोपी और तत्कालीन इंस्पेक्टर एस. श्रीधर पर 15 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। जज मुथुकुमार ने स्पष्ट किया कि चूंकि पुलिसकर्मियों ने दो निर्दोष लोगों की जान ली थी, इसलिए उन्हें ‘दोहरी मौत की सजा’ दी जाती है। सजा पाने वालों में इंस्पेक्टर के अलावा सब-इंस्पेक्टर रघु गणेश, बालकृष्णन और कई कॉन्स्टेबल शामिल हैं। मामले के 10वें आरोपी पॉलदुरई की पहले ही कोविड-19 के कारण मृत्यु हो चुकी थी, जिस वजह से उनके खिलाफ कार्यवाही समाप्त कर दी गई थी।
इस फैसले का तमिलनाडु सहित पूरे देश में स्वागत हो रहा है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि यह निर्णय पुलिस हिरासत में होने वाली हिंसा (Custodial Torture) के खिलाफ एक मिसाल बनेगा। यह आदेश स्पष्ट संदेश देता है कि कानून की रक्षा करने वालों को कानून हाथ में लेने या अपनी शक्तियों का दुरुपयोग कर नागरिकों की जान लेने का कोई अधिकार नहीं है। पीड़ित परिवार के लिए यह चार साल के लंबे संघर्ष के बाद मिले न्याय की जीत है।

