रायपुर: चैत्र नवरात्रि हिंदू धर्म के सबसे पवित्र और ऊर्जावान त्योहारों में से एक है। वर्ष 2026 में चैत्र नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च से हो रही है, जो 27 मार्च को राम नवमी के साथ संपन्न होगी। यह पर्व केवल व्रत और उपवास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वसंत ऋतु के आगमन और प्रकृति के पुनर्जन्म का उत्सव भी है। इसी दिन से हिंदू नव वर्ष (विक्रम संवत 2083) का आरंभ होता है, जो इसे आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है।
माँ दुर्गा के नौ रूपों की उपासना
इन नौ दिनों में भक्त माँ दुर्गा के नौ विभिन्न स्वरूपों—शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री—की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। प्रत्येक देवी का स्वरूप मनुष्य के जीवन के विभिन्न गुणों जैसे साहस, धैर्य, ज्ञान और करुणा का प्रतीक है। कलश स्थापना के साथ शुरू होने वाली यह साधना साधक को मानसिक और शारीरिक शुद्धि का मार्ग दिखाती है, जिससे नकारात्मकता का नाश और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
ऋतु परिवर्तन और वैज्ञानिक महत्व
आयुर्वेद के दृष्टिकोण से चैत्र नवरात्रि का समय संधि काल होता है, जहाँ शीत ऋतु विदा हो रही होती है और ग्रीष्म ऋतु का आगमन होता है। इस दौरान शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (immunity) संवेदनशील होती है। नवरात्रि के दौरान हल्का सात्विक भोजन और उपवास रखने की परंपरा वैज्ञानिक रूप से शरीर को ‘डिटॉक्स’ करने और नई ऋतु के लिए तैयार करने में मदद करती है। यह संयम और अनुशासन का अभ्यास है जो मन को शांत और एकाग्र बनाता है।
सामाजिक सौहार्द और राम जन्मोत्सव
नवरात्रि का समापन चैत्र शुक्ल नवमी को भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव यानी राम नवमी के साथ होता है। यह दिन अधर्म पर धर्म की विजय और आदर्श जीवन मूल्यों की स्थापना का संदेश देता है। मंदिरों में भजन-कीर्तन, कन्या पूजन और भंडारों का आयोजन समाज में समरसता और सेवा भाव को बढ़ावा देता है। 2026 की चैत्र नवरात्रि हमें अपनी जड़ों से जुड़ने और आधुनिकता के बीच आध्यात्मिक संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा देती है।

