केंद्र सरकार ने देश में आगामी जनगणना (Census) प्रक्रिया को अधिक सुगम, पारदर्शी और व्यापक बनाने के उद्देश्य से सेंसर रूल्स, 1990 में महत्वपूर्ण संशोधन करते हुए ‘सेंसर (अमैंडमेंट) रूल्स, 2026’ को आधिकारिक तौर पर अधिसूचित कर दिया है। इस नए संशोधन के बाद अब देश में जनगणना कार्यों के लिए प्रगणकों (एन्यूमेरेटर) और सुपरवाइज़रों की नियुक्ति के दायरे को बहुत अधिक विस्तृत कर दिया गया है, जिससे प्रशासनिक अमले को मैदानी स्तर पर पर्याप्त मानव संसाधन मिलने की उम्मीद है।
नए नियमों के आने से सबसे बड़ा बदलाव शिक्षण संस्थानों के क्षेत्र में हुआ है। अब तक केवल सरकारी और स्थानीय निकायों के विद्यालयों के शिक्षकों को ही इस कार्य में लगाया जाता था, लेकिन नए नियमों के तहत अब एडेड (सहायताप्राप्त) और गैर-सहायताप्राप्त (Unaided) प्राइवेट स्कूलों के शिक्षक भी विधिवत रूप से जनगणना कार्य के लिए तैनात किए जा सकेंगे। सरकार के इस कदम से देश भर के निजी शिक्षण संस्थानों के कार्मिकों को भी राष्ट्रीय महत्व के इस कार्य में सीधी भागीदारी निभाने का अवसर मिलेगा।
शिक्षकों के अलावा इस संशोधन में क्लर्कों और अन्य प्रशासनिक कर्मचारियों के दायरे को भी अभूतपूर्व रूप से बढ़ाया गया है। अब केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों के कार्यालयों के अलावा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs), सांविधिक निकायों (Statutory Bodies), राष्ट्रीयकृत एवं निजी बैंकों, विभिन्न प्राइवेट कंपनियों, संस्थानों, सोसाइटियों और ट्रस्टों में कार्यरत क्लर्क तथा अन्य योग्य अधिकारियों व कर्मचारियों को भी एन्यूमेरेटर या सुपरवाइज़र बनाया जा सकेगा।
इन विशिष्ट श्रेणियों के अलावा, संशोधित नियमों के अंतर्गत राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों (UT) के प्रशासनों को व्यापक छूट भी प्रदान की गई है। इसके तहत संबंधित राज्य सरकारें अपनी स्थानीय आवश्यकताओं और कार्य की सुविधानुसार किसी भी अन्य उपयुक्त व्यक्ति को भी जनगणना जैसे महत्वपूर्ण कार्य के लिए नियुक्त करने के लिए अधिकृत होंगी, जिससे फील्ड स्तर पर कर्मचारियों की कमी की समस्या का समाधान आसानी से हो सकेगा।
नियमों में यह संशोधन करने के पीछे हाल के वर्षों में देश के कई राज्यों में उत्पन्न हुई कानूनी अड़चनें और अदालती विवाद मुख्य वजह रहे हैं। पिछले कुछ समय से पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में प्राइवेट स्कूलों के शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों व जनगणना ड्यूटी में लगाए जाने के खिलाफ विभिन्न उच्च न्यायालयों में कई याचिकाएं दायर की गई थीं। कई मामलों में अदालतों ने पुराने नियमों का हवाला देते हुए निजी संस्थानों के कर्मियों की जबरन ड्यूटी लगाने पर रोक लगाई थी या उन्हें राहत दी थी।
याचिकाकर्ताओं द्वारा यह मुख्य तर्क दिया जाता था कि तत्कालीन कानूनी प्रावधानों और नियमों में प्राइवेट संस्थानों या गैर-सरकारी क्षेत्रों के कर्मचारियों को जनगणना जैसे राजकीय कार्यों में शामिल करने का स्पष्ट कानूनी अधिकार या प्रावधान नहीं है। अदालतों के इन फैसलों और बार-बार उठने वाले कानूनी विवादों को हमेशा के लिए दूर करने तथा प्रशासनिक व्यवस्था को कानूनी रूप से मजबूत बनाने के लिए केंद्र सरकार ने यह ऐतिहासिक संशोधन किया है।
इस संशोधन के बाद, जनगणना अधिनियम, 1948 (Census Act, 1948) के प्रावधानों के अंतर्गत एक बार जब किसी भी पात्र व्यक्ति को आधिकारिक रूप से जनगणना अधिकारी के रूप में नियुक्त कर दिया जाएगा, तो यह उसकी एक वैधानिक जिम्मेदारी बन जाएगी। कानून के अनुसार, इस प्रकार नियुक्त किए गए सभी कर्मियों को लोक सेवक (Public Servant) का दर्जा प्राप्त होगा, जिससे उनके कर्तव्यों की गंभीरता और बढ़ जाती है।
अंततः, यदि कोई भी अधिकृत व्यक्ति बिना किसी वैध या ठोस कारण के इस महत्वपूर्ण राष्ट्रीय ड्यूटी से इनकार करता है या अपने कार्यों के निर्वहन में किसी भी प्रकार की लापरवाही बरतता है, तो उसे संबंधित अधिनियम के तहत सख्त दंडात्मक कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। सरकार के इस दूरदर्शी कदम से देश की अगली जनगणना प्रक्रिया को समयबद्ध और सुचारू रूप से पूरा करने में बड़ी मदद मिलेगी।

