आधुनिक डिजिटल युग में रातों-रात इंटरनेट सेंसेशन बनने की अंधी दौड़ में लाइक्स, व्यूज और फॉलोअर्स पाने के लिए लोग किसी भी हद तक जाने लगे हैं। इस चकाचौंध भरी दुनिया में सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कम उम्र के मासूम बच्चों को इस अंधी दौड़ में झोंक दिया गया है। कई कंटेंट क्रिएटर्स व्यूज बटोरने के लिए बच्चों से जबरन स्क्रिप्टेड, संवेदनशील और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने वाले वीडियो शूट करवाते हैं। इस गंभीर मामले का संज्ञान लेते हुए राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (NHRC) ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है और इसे बाल अधिकारों का खुला उल्लंघन माना है।
आयोग ने उत्तर प्रदेश के एटा जिले की एक घटना को मुख्य आधार बनाते हुए स्वतः संज्ञान लिया है, जहां एक कोचिंग सेंटर से जुड़े बच्चों को स्क्रिप्टेड, राजनीतिक रूप से चार्ज्ड और अपमानजनक वीडियो में बार-बार इस्तेमाल किया जा रहा था। इस बाल अधिकारों के हनन पर कड़ा एक्शन लेते हुए NHRC ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) और जिला मजिस्ट्रेट (DM) एटा के साथ-साथ मेटा इंडिया (Meta India) के प्रबंध निदेशक और इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के सचिव को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर विस्तृत एक्शन टेकन रिपोर्ट (ATR) मांगी है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा मेटा को भेजे गए नोटिस में मुख्य सवाल यह उठाया गया है कि बाल सुरक्षा और कम्युनिटी गाइडलाइंस के दावों के बावजूद ऐसे स्क्रिप्टेड वीडियो प्लेटफॉर्म पर धड़ल्ले से कैसे अपलोड और वायरल होते रहे। आयोग का तर्क है कि मेटा जैसी वैश्विक कंपनियों के पास अत्याधुनिक एल्गोरिदम और मॉडरेशन टूल्स होने के बावजूद यदि ऐसा कंटेंट लाखों दर्शकों तक पहुंचता रहा और मुद्रीकरण के जरिए कमाई होती रही, तो यह उनकी निगरानी प्रणाली पर बड़ा सवालिया निशान है। NHRC ने मेटा से स्पष्टीकरण मांगा है कि बच्चों के शोषण को रोकने के लिए तकनीकी और जमीनी स्तर पर क्या कड़े कदम उठाए जा रहे हैं।
कम उम्र के बच्चों को कैमरे के सामने स्क्रिप्ट रटाकर रोने, डरने या आपत्तिजनक अभिनय कराने से उनके कोमल मन पर बेहद गहरा और नकारात्मक मनोवैज्ञानिक असर पड़ता है। बच्चे उस उम्र में नहीं होते कि वे वर्चुअल दुनिया के दुष्प्रभावों और लाइक्स-व्यूज के दबाव को समझ सकें, जबकि कई बार लालची कंटेंट क्रिएटर या माता-पिता पैसों के चक्कर में उनके बचपन और निजता का सौदा कर देते हैं। आयोग के अनुसार बच्चों को मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि विशेष सुरक्षा के अधिकारी के रूप में देखा जाना चाहिए, और जांच का मुख्य केंद्र उन वयस्कों की पहचान होना चाहिए जो इसके पीछे हैं।
स्थानीय प्रशासन और पुलिस को यह निर्देश दिए गए हैं कि वे तुरंत उन बच्चों की पहचान कर उनकी उचित काउंसलिंग कराएं और संज्ञेय अपराध पाए जाने पर एफआईआर दर्ज कर कड़ी कानूनी कार्रवाई करें। साथ ही, MeitY को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के उचित मुस्तैदी और बाल सुरक्षा तंत्र की सख्ती से समीक्षा करने को कहा गया है। यह पूरा मामला सिर्फ एक कंपनी तक सीमित न होकर हमारे समाज और पैरेंटिंग पर भी सवाल खड़ा करता है, जिसमें माता-पिता को समझना होगा कि बच्चों की सुरक्षा किसी भी वायरल वीडियो से ज्यादा कीमती है।

