बस्तर संभाग में माओवादियों का दशकों पुराना नेटवर्क अब अपने सबसे कमजोर दौर में पहुंच चुका है। हाल ही में माओवादी कमांडर पापाराव के जगदलपुर में और PLGA इंचार्ज सोढ़ी केसा के तेलंगाना में आत्मसमर्पण करने से संगठन को गहरा झटका लगा है। इन बड़े नेताओं के मुख्यधारा में लौटने से निचले कैडर का मनोबल पूरी तरह टूट चुका है, जिसके परिणामस्वरूप अब बस्तर के जंगलों में सक्रिय माओवादियों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई है।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए बस्तर आईजी सुंदरराज पी. ने माओवादियों को बेहद कड़ा और स्पष्ट संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि बीजापुर, सुकमा, नारायणपुर और कांकेर के सीमावर्ती इलाकों में अब केवल गिनती के माओवादी ही शेष बचे हैं। आईजी ने इसे ‘मुख्यधारा में लौटने का आखिरी मौका’ करार देते हुए चेतावनी दी है कि यदि वे अब भी आत्मसमर्पण नहीं करते हैं, तो सुरक्षा बलों द्वारा चलाए जा रहे ऑपरेशंस को और अधिक आक्रामक और तेज किया जाएगा।
छत्तीसगढ़ के साथ-साथ तेलंगाना में भी माओवादी आंदोलन पतन की ओर है। तेलंगाना के डीजीपी शिवधर रेड्डी के अनुसार, साल 2024 की शुरुआत में संगठन से जुड़े तेलंगाना मूल के लोगों की संख्या जो 125 थी, वह अब घटकर मात्र 5 रह गई है। हालांकि, इन बचे हुए लोगों में गणपति और महिला माओवादी रूपी जैसे कुछ बड़े और कट्टर नाम शामिल हैं, जो अब भी पुलिस की पकड़ से बाहर अंडरग्राउंड रहकर अपनी गतिविधियां चलाने की कोशिश कर रहे हैं।
वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए यह साफ है कि बस्तर में माओवाद का ढांचा लगभग ढह चुका है। सुरक्षा बलों के निरंतर बढ़ते दबाव और सरकार की आकर्षक आत्मसमर्पण नीतियों ने नक्सलियों को रक्षात्मक स्थिति में ला खड़ा किया है। अब यह उन अंतिम बचे हुए कैडरों पर निर्भर करता है कि वे शांति का रास्ता चुनकर समाज की मुख्यधारा में शामिल होते हैं या सुरक्षा बलों के साथ होने वाली सीधी मुठभेड़ में अपनी किस्मत का फैसला करते हैं।
इस निर्णायक मोड़ पर बस्तर प्रशासन और सुरक्षा बल बेहद सतर्क हैं, क्योंकि माओवाद के इस ‘अंतिम दौर’ को पूरी तरह समाप्त करना क्षेत्र में स्थायी शांति बहाली के लिए अनिवार्य है। आने वाले कुछ महीने बस्तर के भविष्य और नक्सलवाद के पूर्ण खात्मे की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण साबित होने वाले हैं।

