हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और भू-राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से दुनिया के सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण जलमार्गों में गिना जाता है। वर्तमान समय में यह क्षेत्र पारंपरिक नौसैनिक प्रतिस्पर्धा से आगे निकलकर कई आधुनिक, जटिल और अभूतपूर्व सुरक्षा चुनौतियों के दौर से गुजर रहा है। मध्य पूर्व, लाल सागर और पश्चिमी एशिया के जलक्षेत्र में जारी हालिया संघर्षों और भड़के तनावों ने हिंद महासागर के समुद्री मार्गों की सुरक्षा को गंभीर संकट में डाल दिया है। भारत अपनी कुल ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा और विदेशी व्यापार इसी रास्ते से संचालित करता है, इसलिए इस क्षेत्र में उत्पन्न होने वाली हर एक भू-राजनीतिक उथल-पुथल सीधे तौर पर देश की आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित कर रही है, जिससे निपटने के लिए रणनीतिक गलियारों में नई गश्त प्रणालियां तैनात की जा रही हैं।
इन सामरिक संकटों के बीच समुद्री ड्रोन, अत्याधुनिक मिसाइलों और असममित युद्ध (Asymmetric Warfare) की तकनीकों का तेजी से बढ़ता उपयोग एक नया और चिंताजनक अध्याय साबित हो रहा है। हाल के दिनों में हिंद महासागर और आसपास के व्यापारिक मार्गों पर मर्चेंट जहाजों और ऊर्जा टैंकरों को निशाना बनाने की घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक युद्ध के तौर-तरीके अब समुद्र के भीतर और सतह पर पूरी तरह बदल चुके हैं। पारंपरिक नौसैनिक बेड़ों और युद्धपोतों की मौजूदगी के बावजूद, छोटे और घातक ड्रोनों या मिसाइलों के जरिए होने वाले इन अचानक हमलों ने भारतीय नौसेना और तटरक्षक बल के सामने सुरक्षा का एक नया संकट खड़ा कर दिया है, जिससे निपटने के लिए अब एंटी-ड्रोन तकनीक और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम को प्राथमिकता दी जा रही है।
इसके साथ ही, हिंद महासागर के रणनीतिक गलियारों में गैर-क्षेत्रीय महाशक्तियों, विशेषकर चीन की बढ़ती सैन्य उपस्थिति और आक्रामक गतिविधियों ने भारत की भू-राजनीतिक चिंताओं को कई गुना बढ़ा दिया है। चीनी नौसेना की बढ़ती परमाणु और पारंपरिक पनडुब्बियों की आवाजाही, हिंद महासागर के तटीय देशों में बंदरगाहों और बुनियादी ढांचे के विकास की आड़ में अपने सामरिक पैर पसारने की कोशिशें (जैसे ‘मोती की माला’ या ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ की रणनीति) भारत के पारंपरिक प्रभाव क्षेत्र के लिए एक स्थायी चुनौती बन चुकी हैं। बीजिंग की इन हरकतों पर बारीक नजर रखने के लिए भारत को न केवल अपनी नौसैनिक ताकत में इजाफा करना पड़ रहा है, बल्कि हिंद महासागर के अन्य मित्र देशों के साथ मिलकर मजबूत सुरक्षा ढांचे तैयार करने के लिए भी कड़े कूटनीतिक और सामरिक कदम उठाने पड़ रहे हैं।
समुद्री आतंकवाद, हथियारों की अवैध तस्करी, समुद्र के रास्ते घुसपैठ और संगठित अपराधों (जैसे ड्रग्स और नशीले पदार्थों का काला कारोबार) का खतरा भी भारतीय तटीय सुरक्षा के लिए लगातार एक गंभीर आंतरिक चुनौती बना हुआ है। मुंबई में हुए 26/11 के आतंकी हमलों के बाद से भारत ने अपने तटीय सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने के लिए कई स्तरों पर काम किया है, जिसमें तटीय राज्यों की पुलिस, मरीन कमांडो, नौसेना और सीमा सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय शामिल है। इसके बावजूद, विशाल तटरेखा और हजारों छोटे द्वीपों व दूरदराज के इलाकों की मौजूदगी के कारण राष्ट्र-विरोधी तत्वों और तस्करों द्वारा सुरक्षा में सेंध लगाने के प्रयास समय-समय पर सामने आते रहते हैं, जिससे खुफिया तंत्र को और अधिक चौकस रखने की आवश्यकता बनी हुई है।
इन तमाम बाहरी और आंतरिक खतरों के अलावा, समुद्र के भीतर मौजूद महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा (क्रिटिकल अंडरवाटर इंफ्रास्ट्रक्चर) अब सुरक्षा एजेंसियों की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल हो गया है। वैश्विक इंटरनेट डेटा ट्रैफिक का बड़ा हिस्सा समुद्र की गहराइयों में बिछी पनडुब्बी संचार केबलों (Submarine Cables) के माध्यम से संचालित होता है, जबकि देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने वाले अपतटीय (Offshore) तेल और प्राकृतिक गैस के कुएं और प्लेटफॉर्म भी समुद्र में ही स्थित हैं। वर्तमान समय में ये अंडरवाटर संपत्तियां तोड़फोड़, राष्ट्र-विरोधी ताकतों के हमलों या साइबर घुसपैठ के लिहाज से बेहद संवेदनशील और आसान लक्ष्य बन चुकी हैं। यदि इन महत्वपूर्ण ढांचों को कोई नुकसान पहुंचता है, तो देश की अर्थव्यवस्था और संचार व्यवस्था कुछ ही पलों में ठप हो सकती है।
इन बहुआयामी और गंभीर चुनौतियों से पार पाने के लिए भारत सरकार और रक्षा मंत्रालय ने अपनी सुरक्षा रणनीतियों में व्यापक बदलाव किए हैं। भारतीय नौसेना, भारतीय तटरक्षक बल और अन्य खुफिया एजेंसियां अत्याधुनिक उपग्रह आधारित निगरानी प्रणालियों, उन्नत तटीय रडार नेटवर्क और गुरुग्राम स्थित ‘सूचना संलयन केंद्र-हिंद महासागर क्षेत्र’ (IFC-IOR) के माध्यम से समुद्री गतिविधियों पर चौबीसों घंटे पैनी नजर रख रही हैं। इसके साथ ही, मित्र देशों और क्वाड (Quad) जैसे समूहों के साथ खुफिया जानकारी साझा करने और संयुक्त समुद्री युद्धाभ्यास करने की दिशा में तेजी से काम चल रहा है, ताकि हिंद महासागर को एक सुरक्षित, मुक्त और नियम-आधारित मार्ग बनाए रखा जा सके।

