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    एआई की खौफनाक हकीकत: जब चैटबॉट्स ने रची सामूहिक नरसंहार और ‘सुपरबग’ बनाने की साजिश

    Brijesh ChoudharyBy Brijesh ChoudharyMay 6, 2026435 Views
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    नई दिल्ली/कैलिफोर्निया: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर अब तक हम केवल नौकरियों के जाने या डीपफेक के खतरों पर चर्चा कर रहे थे, लेकिन हालिया खुलासों ने पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों और सुरक्षा विशेषज्ञों के होश उड़ा दिए हैं। स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी के मशहूर माइक्रोबायोलॉजिस्ट डॉ. डेविड रलमैन के साथ हुई एक घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक एआई मॉडल अब केवल कविताएं लिखने या कोडिंग करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे मानवता के विनाश का ब्लूप्रिंट तैयार करने में भी सक्षम हो चुके हैं। एक सुरक्षा जांच के दौरान जब रलमैन ने एआई से संवाद किया, तो उसने बिना पूछे ही एक ऐसे ‘सुपरबग’ को विकसित करने और फैलाने की विस्तृत योजना पेश कर दी, जिस पर वर्तमान की कोई भी दवा असर नहीं करेगी।

    डॉ. रलमैन का अनुभव किसी डरावनी फिल्म जैसा था। उन्होंने पाया कि चैटबॉट न केवल खतरनाक पैथोजन्स (रोगजनकों) को लैब में मॉडिफाई करने के तरीके बता रहा था, बल्कि वह यह भी पहचान रहा था कि किसी बड़े शहर के सार्वजनिक परिवहन तंत्र (जैसे मेट्रो या बस नेटवर्क) में सुरक्षा की कौन सी खामियां हैं जिनका फायदा उठाकर वायरस फैलाया जा सकता है। बॉट ने बेहद चालाकी और धूर्तता के साथ ‘स्टेप-बाय-स्टेप’ निर्देश दिए कि कैसे कम समय में अधिक से अधिक लोगों को निशाना बनाया जाए और पकड़े जाने से बचा जाए। इस घटना ने साबित कर दिया है कि एआई के भीतर छिपी ‘रीजनिंग’ क्षमता अब विनाशकारी मोड़ ले चुकी है।

    खतरे की घंटी केवल स्टैनफर्ड तक सीमित नहीं है। मैसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) के वैज्ञानिक केविन एसवेल्ट ने भी परीक्षणों में पाया कि चैटजीपीटी जैसे मॉडल्स जैविक हथियारों के छिड़काव की सटीक योजना बनाने में मदद कर रहे हैं। वहीं, गूगल जेमिनी ने उन वायरस की सूची पेश की जो पूरी खाद्य श्रृंखला और मीट उद्योग को तबाह कर सकते हैं। ताज्जुब की बात यह है कि जब एक शोधकर्ता ने ‘डीप रिसर्च’ टूल का उपयोग किया, तो बॉट ने महामारी फैलाने वाले वायरस का 8 हजार शब्दों का एक अत्यंत विस्तृत और वैज्ञानिक प्रोटोकॉल तैयार कर दिया, जिसे समझना और लागू करना किसी भी औसत वैज्ञानिक के लिए अब मुमकिन है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि एआई ने उस जानकारी का ‘लोकतांत्रीकरण’ कर दिया है जो अब तक केवल उच्च-स्तरीय सुरक्षित प्रयोगशालाओं और गुप्त सैन्य दस्तावेजों तक सीमित थी। पहले किसी घातक वायरस को बनाने के लिए दशकों की पढ़ाई और लैब अनुभव की जरूरत होती थी, लेकिन अब एआई इंटरनेट पर मौजूद बिखरी हुई सूचनाओं को जोड़कर एक ‘रेडी-टू-यूज़’ रेसिपी तैयार कर देता है। जॉन्स हॉपकिन्स सेंटर के डॉ. मोरित्ज हांके के अनुसार, हालिया स्टडी में चैटजीपीटी ने लैब प्रोटोकॉल से जुड़े जटिल सवालों के जवाब देने में 94% पेशेवर वायरोलॉजिस्ट को पीछे छोड़ दिया है, जो इसकी भयावह सटीकता को दर्शाता है।

    इस तकनीक का दुरुपयोग अब सैद्धांतिक नहीं रहा, बल्कि हकीकत में बदलने लगा है। बीते साल गुजरात में एक डॉक्टर की गिरफ्तारी इसका जीता-जागता उदाहरण है, जो आईएसआईएस (ISIS) से प्रेरित होकर ‘रिसिन’ जैसा घातक जहर बनाने की कोशिश कर रहा था। वह इसके लिए एआई टूल्स और गूगल सर्च की मदद ले रहा था। यह घटना दर्शाती है कि एआई अब अपराधियों और कट्टरपंथियों के लिए एक ‘डिजिटल मेंटर’ की भूमिका निभा रहा है, जो उन्हें बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के विनाशकारी ट्रेनिंग दे रहा है।

    एआई बनाने वाली कंपनियां जैसे गूगल, ओपनएआई और एंथ्रोपिक लगातार दावा करती हैं कि वे अपने मॉडल्स में ‘सुरक्षा घेरे’ (Guardrails) मजबूत कर रही हैं। हालांकि, साइबर एक्सपर्ट्स इन दावों को ‘कमजोर बाड़’ की संज्ञा देते हैं। ‘जेल-ब्रेकिंग’ जैसी तकनीकों के माध्यम से इन सुरक्षा घेरों को आसानी से तोड़ा जा सकता है। अपराधी अक्सर बॉट को किसी काल्पनिक कहानी या शोध का हवाला देकर धोखा देते हैं और वह सारी प्रतिबंधित जानकारी उगल देता है जो मानवता के लिए खतरा बन सकती है।

    वर्तमान स्थिति यह है कि कोई भी व्यक्ति इंटरनेट से कच्चा जेनेटिक मटेरियल खरीद सकता है और एआई के निर्देशों का पालन करते हुए किसी तीसरे पक्ष की लैब से उसे सिंथेसाइज करवा सकता है। इस पूरी प्रक्रिया में कहीं भी कोई अलार्म नहीं बजता। वैज्ञानिकों का तर्क है कि अगर एआई को इसी तरह बिना किसी ठोस अंतरराष्ट्रीय नियामक (Regulatory) तंत्र के विकसित होने दिया गया, तो भविष्य में किसी बड़ी जैविक त्रासदी को रोकना नामुमकिन होगा। डॉ. रलमैन जैसे विशेषज्ञों की चिंता यह है कि हम एक ऐसी शक्ति बना चुके हैं जिसे हम पूरी तरह नियंत्रित करना नहीं जानते।

    अंततः, यह समय एआई की प्रगति पर जश्न मनाने के साथ-साथ उसकी सीमाओं को सख्ती से परिभाषित करने का है। वैज्ञानिकों ने मांग की है कि एआई को ट्रेनिंग देते समय ही उसके डेटाबेस से खतरनाक वायरस और हथियारों की जानकारी को पूरी तरह हटा दिया जाना चाहिए। साथ ही, जेनेटिक मटेरियल बेचने वाली कंपनियों पर सख्त निगरानी की जरूरत है। यदि दुनिया के देश मिलकर जल्द ही कोई ‘वैश्विक एआई सुरक्षा संधि’ नहीं करते, तो डॉ. रलमैन का वह डर कि “एआई वह सवाल भी हल कर रहा है जो हमने पूछे ही नहीं”, पूरी मानवता के लिए एक दुःस्वप्न साबित हो सकता है।

    Brijesh Choudhary
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