बेंगलुरु: राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA) की एक विशेष अदालत ने शनिवार को बेंगलुरु जेल कट्टरपंथ मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के सहयोगी विक्रम कुमार उर्फ ‘छोटा उस्मान’ को सात साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने विक्रम को भारतीय दंड संहिता (IPC), गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी पाया। सजा के साथ-साथ दोषी पर 30,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है।
यह मामला 2023 में तब सुर्खियों में आया था जब बेंगलुरु सेंट्रल क्राइम ब्रांच ने शहर में आतंकी हमलों की योजना बना रहे कुछ अपराधियों को हथियारों और गोला-बारूद के साथ गिरफ्तार किया था। बाद में एनआईए ने इस जांच को अपने हाथ में लिया, जिससे जेल के भीतर चल रहे एक खतरनाक आतंकी नेटवर्क का भंडाफोड़ हुआ। जांच में सामने आया कि यह पूरी साजिश बेंगलुरु की परप्पन्ना अग्रहारा केंद्रीय जेल की सलाखों के पीछे रची गई थी, जहाँ विचाराधीन कैदियों को आतंकी गतिविधियों के लिए तैयार किया जा रहा था।
एनआईए की चार्जशीट के मुताबिक, विक्रम कुमार इस मामले में दोषी ठहराया जाने वाला आठवां व्यक्ति है। जांच में यह स्पष्ट हुआ कि जब विक्रम बेंगलुरु जेल में बंद था, तब उसका संपर्क लश्कर-ए-तैयबा के सदस्य टी. नसीर और एक अन्य आरोपी जुनैद अहमद से हुआ था। टी. नसीर, जो 2008 के बेंगलुरु सिलसिलेवार बम धमाकों का मुख्य आरोपी है, ने जेल के भीतर ही विक्रम को कट्टरपंथी बनाया और उसे आतंकी संगठन के उद्देश्यों के लिए काम करने के लिए भर्ती किया।
जेल से रिहा होने के बाद भी विक्रम कुमार आतंकी आकाओं के संपर्क में रहा और उनके निर्देशों का पालन करता रहा। मई 2023 में, उसने एक बड़ी आतंकी साजिश को अंजाम देने के लिए हरियाणा के अंबाला से हथगोले और वॉकी-टॉकी का एक बड़ा जखीरा इकट्ठा किया था। इन हथियारों को उसने बेंगलुरु लाकर एक सह-आरोपी को सौंपा था, जिसका उद्देश्य शहर की शांति और सुरक्षा को भंग करना था।
जांच एजेंसी ने एक और चौंकाने वाला खुलासा किया कि यह नेटवर्क केवल हमलों तक सीमित नहीं था। जुनैद अहमद द्वारा वित्त पोषित यह समूह टी. नसीर को जेल से अदालत ले जाने के दौरान पुलिस हिरासत से भगाने की योजना भी बना रहा था। इस ‘जेल ब्रेक’ साजिश का मकसद लश्कर-ए-तैयबा के भारत विरोधी एजेंडे को आगे बढ़ाना और देश की संप्रभुता को गंभीर नुकसान पहुंचाना था।
पिछले महीने ही, अदालत ने इस मामले के मुख्य साजिशकर्ता टी. नसीर सहित सात अन्य आरोपियों को सजा सुनाई थी। इन सभी पर जेल के भीतर रहकर आतंकी नेटवर्क चलाने और युवाओं को गुमराह करने का आरोप सिद्ध हुआ था। एनआईए की इस लगातार कानूनी सफलता को आतंकवाद के खिलाफ भारत की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति के तहत एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है।
हालांकि एनआईए ने इस मामले में कुल 12 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की है, जिनमें से 8 को अब तक सजा मिल चुकी है, लेकिन मास्टरमाइंड जुनैद अहमद अभी भी कानून की गिरफ्त से बाहर है। जुनैद पर आरोप है कि उसने ही इस पूरे ऑपरेशन के लिए वित्तीय मदद और दिशा-निर्देश उपलब्ध कराए थे। वह वर्तमान में फरार है और माना जा रहा है कि वह विदेश से अपनी गतिविधियां चला रहा है।
आतंकवाद रोधी एजेंसी ने स्पष्ट किया है कि फरार आरोपियों, विशेषकर जुनैद अहमद को पकड़ने के लिए ठोस प्रयास जारी हैं। एनआईए इस नेटवर्क के अंतरराष्ट्रीय संपर्कों और वित्तीय स्रोतों की गहराई से जांच कर रही है ताकि देश की आंतरिक सुरक्षा को चुनौती देने वाले ऐसे किसी भी भविष्य के खतरे को पूरी तरह से समाप्त किया जा सके।

