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    Home»Uncategorized»मिडिल ईस्ट संकट और $126 तेल के बावजूद रिकॉर्ड तोड़ GST वसूली; 8.7% की बढ़त के साथ ₹2.42 लाख करोड़ पार
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    मिडिल ईस्ट संकट और $126 तेल के बावजूद रिकॉर्ड तोड़ GST वसूली; 8.7% की बढ़त के साथ ₹2.42 लाख करोड़ पार

    Brijesh ChoudharyBy Brijesh ChoudharyMay 2, 2026241 Views
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    नई दिल्ली: वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक अस्थिरता और मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। चालू वित्त वर्ष की शुरुआत में ही देश के वस्तु एवं सेवा कर (GST) संग्रह ने सारे पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2026 में कुल जीएसटी कलेक्शन ₹2.42 लाख करोड़ के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया है, जो भारत की मजबूत आंतरिक आर्थिक गतिशीलता को दर्शाता है।

    इस बार की ऐतिहासिक वृद्धि ने पिछले साल के रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ दिया है। अप्रैल 2025 में जीएसटी संग्रह ₹2.23 लाख करोड़ रहा था, जिसके मुकाबले इस साल करीब 8.7% की भारी बढ़त दर्ज की गई है। यह लगातार दूसरा साल है जब अप्रैल के महीने में संग्रह ने ₹2 लाख करोड़ की मनोवैज्ञानिक बाधा को पार किया है। सरकार के लिए यह आंकड़े इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये नए वित्त वर्ष के लिए एक बेहद सकारात्मक आधार तैयार करते हैं।

    आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह वृद्धि केवल व्यापार के विस्तार से ही नहीं, बल्कि बेहतर कर अनुपालन (Tax Compliance) और मजबूत घरेलू खपत के कारण भी संभव हो सकी है। शुद्ध जीएसटी राजस्व (Net GST Revenue) की बात करें तो रिफंड हटाने के बाद यह आंकड़ा ₹2.11 लाख करोड़ रहा, जिसमें पिछले साल की तुलना में 7.3% की वृद्धि देखी गई है। यह स्पष्ट करता है कि व्यापारिक गतिविधियों में पारदर्शिता बढ़ी है और कर चोरी पर लगाम लगी है।

    राज्यों के प्रदर्शन पर नजर डालें तो आर्थिक महाशक्ति के रूप में महाराष्ट्र ने एक बार फिर अपनी बादशाहत कायम रखी है। अकेले महाराष्ट्र से ₹13,793 करोड़ का कर संग्रह हुआ है। इसके बाद कर्नाटक, गुजरात, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों ने शीर्ष पांच में जगह बनाई है। इन राज्यों में बढ़ती औद्योगिक गतिविधियों और सेवा क्षेत्र के विस्तार ने राष्ट्रीय खजाने को भरने में अहम भूमिका निभाई है।

    हालांकि, यह रिकॉर्ड संग्रह एक चुनौतीपूर्ण वैश्विक पृष्ठभूमि के बीच आया है। वर्तमान में मिडिल ईस्ट में ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच गहराते संघर्ष ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के बंद होने की आशंका ने वैश्विक व्यापारिक गलियारों में तनाव पैदा कर दिया है। इस तनाव का सीधा असर ऊर्जा बाजार पर पड़ा है, जिससे भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए आयात बिल बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है।

    भू-राजनीतिक तनाव के चलते कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल देखा गया है। आंकड़ों के मुताबिक, 30 अप्रैल को ब्रेंट क्रूड की कीमत 126 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई। कच्चे तेल की इन ऊंची कीमतों का असर आमतौर पर परिवहन और उत्पादन लागत पर पड़ता है, लेकिन इसके बावजूद भारत के घरेलू बाजार में मांग और व्यापारिक लेन-देन में कोई बड़ी गिरावट नहीं देखी गई, जो भारतीय बाजार की परिपक्वता को साबित करता है।

    पूरे वित्त वर्ष 2025-26 के प्रदर्शन को देखें तो देश का कुल ग्रॉस जीएसटी कलेक्शन 8.3 प्रतिशत की दर से बढ़कर ₹22.27 लाख करोड़ तक जा पहुंचा है। पिछले वित्त वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा ₹20.55 लाख करोड़ था। यह वार्षिक वृद्धि दर्शाती है कि भारत वैश्विक मंदी और अनिश्चितताओं के तूफानों के बीच भी अपनी विकास दर को सुरक्षित रखने में सफल रहा है।

    जीएसटी के ये आंकड़े केवल सरकारी खजाने की मजबूती की कहानी नहीं कहते, बल्कि यह निवेशकों के लिए भी एक बड़ा संदेश है। वैश्विक सप्लाई चेन में बाधाओं और युद्ध जैसी स्थितियों के बीच भारत का कर संग्रह बढ़ना इस बात का प्रमाण है कि देश का मध्यम वर्ग और उपभोक्ता बाजार अभी भी तेजी से विस्तार कर रहा है। आने वाले महीनों में यदि वैश्विक स्थितियां सुधरती हैं, तो यह रफ्तार और भी तेज होने की उम्मीद है।

    अंततः, अप्रैल के ये आंकड़े मार्च महीने की आर्थिक गतिविधियों का प्रतिबिंब हैं। सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब इस रफ्तार को साल के बाकी महीनों में भी बनाए रखने की होगी। कच्चे तेल की कीमतें और वैश्विक संघर्ष की अवधि यह तय करेगी कि वित्त वर्ष 2026 के अंत तक भारतीय अर्थव्यवस्था कितनी ऊंचाई पर होगी, लेकिन फिलहाल ₹2.42 लाख करोड़ का यह आंकड़ा देश के आत्मविश्वास को बढ़ाने के लिए पर्याप्त है।

    Brijesh Choudhary
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