महाराष्ट्र में ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए राज्य सरकार ने एक बड़ा निर्णय लिया है, जिसके तहत अब चालकों के लिए मराठी भाषा का ज्ञान अनिवार्य कर दिया गया है। परिवहन मंत्री प्रताप सरनायक ने स्पष्ट किया है कि राज्य के सभी 59 क्षेत्रीय परिवहन कार्यालयों (RTO) के अंतर्गत आने वाले ड्राइवरों को मराठी पढ़ना और लिखना आना चाहिए। यह कदम स्थानीय संस्कृति को बढ़ावा देने और यात्रियों के साथ बेहतर संवाद सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उठाया गया है।
सरकार ने घोषणा की है कि 1 मई से पूरे राज्य में एक विशेष सत्यापन अभियान चलाया जाएगा। इस अभियान के दौरान आरटीओ अधिकारी सड़कों पर उतरकर रिक्शा और टैक्सी चालकों के लाइसेंस और अन्य आवश्यक दस्तावेजों की गहन जांच करेंगे। यदि किसी चालक के पास वैध दस्तावेज नहीं पाए जाते या नियमों का उल्लंघन मिलता है, तो उनके खिलाफ विभाग द्वारा कड़ी दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।
मराठी भाषा की अनिवार्यता को लेकर शुरुआत में काफी कड़ा रुख अपनाया गया था, लेकिन ऑटो यूनियनों के विरोध को देखते हुए सरकार ने नरमी दिखाई है। प्रशासन ने अब चालकों को मराठी सीखने के लिए 15 अगस्त तक का अतिरिक्त समय प्रदान किया है। इस मोहलत का उद्देश्य उन चालकों को अवसर देना है जो अन्य राज्यों से आए हैं या जिन्हें स्थानीय भाषा बोलने और समझने में कठिनाई होती है।
राहत की इस अवधि के दौरान सरकार और विभिन्न सामाजिक संस्थाएं मिलकर चालकों के लिए मराठी सिखाने के कार्यक्रम आयोजित करेंगी। आरटीओ के माध्यम से इन चालकों को भाषा का बुनियादी ज्ञान दिया जाएगा ताकि वे 15 अगस्त की समय-सीमा तक निर्धारित मानकों को पूरा कर सकें। सरकार का मानना है कि इससे चालकों के कौशल में वृद्धि होगी और वे स्थानीय लोगों के साथ बेहतर तरीके से घुल-मिल सकेंगे।
हालांकि, सरकार ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि मराठी भाषा के लिए दी गई छूट केवल सीखने की अवधि तक ही सीमित है। अन्य नियमों जैसे लाइसेंस की वैधता, फिटनेस सर्टिफिकेट और परमिट के दस्तावेजों में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी पाए जाने पर 1 मई से ही तुरंत कार्रवाई शुरू कर दी जाएगी। प्रशासन किसी भी सूरत में अवैध रूप से वाहन चलाने वालों को छूट देने के पक्ष में नहीं है।
इस फैसले पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तेज हो गई हैं। शिवसेना (UBT) के सांसद संजय राउत ने इस निर्णय का समर्थन करते हुए कहा कि यह ड्राइवरों के अपने हित में है। उन्होंने तर्क दिया कि पश्चिम बंगाल, गुजरात और कर्नाटक जैसे राज्यों में भी स्थानीय भाषाओं को प्राथमिकता दी जाती है, तो महाराष्ट्र में मराठी को अनिवार्य करने पर सवाल क्यों उठाए जा रहे हैं। उन्होंने इसे वोट बैंक की राजनीति से दूर रखने की सलाह दी है।
शुरुआत में इस नियम के विरोध में ट्रेड यूनियनों ने 4 मई से राज्यव्यापी हड़ताल और आंदोलन की चेतावनी दी थी। यूनियनों का कहना था कि अचानक भाषा की शर्त थोपने से हजारों चालकों की रोजी-रोटी पर संकट आ सकता है। इसी विरोध और संभावित असुविधा को देखते हुए राज्य सरकार ने अपने रुख में बदलाव किया और चालकों को सीखने के लिए लगभग साढ़े तीन महीने का समय दिया।
अंततः, 15 अगस्त के बाद सरकार इस बात की समीक्षा करेगी कि कितने चालकों ने भाषा का ज्ञान प्राप्त कर लिया है। यदि इस समय-सीमा के बाद भी कोई चालक मराठी पढ़ने-लिखने में असमर्थ पाया जाता है, तो परिवहन विभाग उनका लाइसेंस रद्द करने जैसी कड़ी कार्रवाई कर सकता है। फिलहाल, 1 मई से शुरू होने वाला सत्यापन अभियान राज्य के परिवहन क्षेत्र में अनुशासन लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

