रायपुर। छत्तीसगढ़ में हाल ही में लागू किए गए छत्तीसगढ़ शासकीय सेवक सेवा संघ नियम-2025 में संशोधन को लेकर राज्य के लाखों अनियमित कर्मचारियों में जबरदस्त उबाल है। छत्तीसगढ़ प्रगतिशील अनियमित कर्मचारी फेडरेशन ने इस कदम को कर्मचारियों की आवाज दबाने वाला और अलोकतांत्रिक करार दिया है। संगठन का आरोप है कि सरकार इस संशोधन के जरिए उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन कर रही है, जिससे भविष्य में अनियमित कर्मचारियों के लिए अपने हितों की रक्षा करना और भी कठिन हो जाएगा।
इस विवाद का मुख्य कारण नियम 2 में किए गए वे बदलाव हैं, जिन्होंने ‘शासकीय सेवक’ और ‘सेवक संघ’ की परिभाषा को पूरी तरह बदल दिया है। नए प्रावधानों के तहत अब केवल नियमित रूप से नियुक्त कर्मचारी ही शासकीय सेवक की श्रेणी में आएंगे। इसके साथ ही, अब केवल उन्हीं संघों को मान्यता दी जाएगी जिनके सभी पदाधिकारी वर्तमान में नियमित सरकारी सेवा में कार्यरत हों। इस तकनीकी बदलाव ने संविदा, दैनिक वेतनभोगी और आउटसोर्सिंग कर्मचारियों को संघ बनाने या उसे संचालित करने के अधिकार से लगभग बाहर कर दिया है।

फेडरेशन के प्रदेश अध्यक्ष गोपाल प्रसाद साहू ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि यह संशोधन संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत दिए गए संघ बनाने के अधिकार का खुला उल्लंघन है। उन्होंने इसे अनियमित कर्मचारियों के लंबे समय से चल रहे नियमितीकरण आंदोलन को कुचलने की एक सोची-समझी साजिश बताया है। कर्मचारियों का कहना है कि वे पहले से ही कम वेतन और अनिश्चित भविष्य से जूझ रहे हैं, और अब यह नया नियम उन्हें ‘बंधुआ मजदूर’ जैसी स्थिति में धकेलने वाला साबित होगा।
वर्तमान में छत्तीसगढ़ के विभिन्न सरकारी विभागों में लाखों कर्मचारी प्लेसमेंट, ठेका, कलेक्टर दर और मानदेय पर अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। ये सभी कर्मचारी लंबे समय से नियमितीकरण की मांग को लेकर संघर्षरत हैं। फेडरेशन ने मुख्यमंत्री से इस ‘कर्मचारी विरोधी’ नियम को तत्काल निरस्त करने की अपील की है। फिलहाल सरकार की ओर से इस विरोध पर कोई स्पष्टीकरण नहीं आया है, लेकिन कर्मचारियों की बढ़ती नाराजगी ने राज्य में एक बड़े आंदोलन की आहट दे दी है।

