दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने 26 साल पुराने एक मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सीबीआई (CBI) के वर्तमान जॉइंट डायरेक्टर रामनीश गीर और एक सेवानिवृत्त अधिकारी वी.के. पांडे को दोषी करार दिया है। यह मामला साल 2000 का है, जब इन अधिकारियों ने भारतीय राजस्व सेवा (IRS) के अधिकारी अशोक कुमार अग्रवाल के घर पर न केवल अवैध रूप से छापेमारी की थी, बल्कि उनके साथ मारपीट और बदसलूकी भी की थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिकारियों द्वारा की गई यह कार्रवाई कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं, बल्कि एक सोची-समझी साजिश थी।
मामले की गंभीरता को देखते हुए जज शशांक नंदन भट्ट ने दोनों अधिकारियों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना), 427 (शरारत से नुकसान पहुंचाना) और 448 (घर में बिना अनुमति घुसना) के तहत दोषी पाया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि 19 अक्टूबर 2000 को की गई तलाशी और गिरफ्तारी की पूरी प्रक्रिया कानून द्वारा दी गई शक्तियों का घोर उल्लंघन थी। इस कार्रवाई का मुख्य उद्देश्य केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) के उस आदेश को निष्प्रभावी करना था, जो अग्रवाल के निलंबन की समीक्षा के पक्ष में था।
शिकायतकर्ता अशोक कुमार अग्रवाल, जो 1985 बैच के आईआरएस अधिकारी हैं, ने आरोप लगाया था कि सीबीआई की टीम सुबह-सवेरे उनके पश्चिम विहार स्थित आवास पर दरवाजा तोड़कर दाखिल हुई थी। उन्होंने बताया कि टीम ने उनके साथ धक्का-मुक्की की और उन्हें घसीटा, जिससे उन्हें शारीरिक चोटें आईं। अग्रवाल का दावा था कि यह पूरी कार्रवाई विभाग के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के साथ उनके व्यक्तिगत विवाद का बदला लेने के लिए की गई थी, ताकि उन्हें कानूनी राहत न मिल सके।
सुनवाई के दौरान आरोपी अधिकारियों ने तर्क दिया कि उन्होंने जो कुछ भी किया, वह उनकी आधिकारिक ड्यूटी का हिस्सा था। उन्होंने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 197 के तहत कानूनी सुरक्षा की मांग की, जो सरकारी कर्मचारियों को ड्यूटी के दौरान किए गए कार्यों के लिए अभियोजन से बचाती है। हालांकि, कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि बिना किसी वैध कारण के किसी के घर का दरवाजा तोड़ना और मारपीट करना किसी भी तरह से ‘ड्यूटी’ के दायरे में नहीं आता।
दोषी ठहराए गए रामनीश गीर 1994 बैच के अधिकारी हैं और वर्तमान में गुवाहाटी में सीबीआई के संयुक्त निदेशक के महत्वपूर्ण पद पर तैनात हैं। उन्हें उनके करियर के दौरान राष्ट्रपति पुलिस पदक से भी सम्मानित किया जा चुका है। घटना के वक्त वह एसपी के पद पर कार्यरत थे। वहीं, दूसरे दोषी वी.के. पांडे उस समय इंस्पेक्टर थे और अब दिल्ली पुलिस से सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) के पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इस फैसले ने उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर एक कड़ा संदेश दिया है।
कोर्ट ने अंततः यह माना कि अभियोजन पक्ष ने आरोपियों के खिलाफ सभी आरोपों को संदेह से परे साबित कर दिया है। जज ने टिप्पणी की कि किसी के निजी आवास में गलत इरादे से प्रवेश करना ‘क्रिमिनल ट्रेसपास’ है और संपत्ति को नुकसान पहुंचाना ‘मिसचीफ’ की श्रेणी में आता है। अब अदालत इस मामले में सजा की अवधि तय करने के लिए अगली सुनवाई करेगी। 26 सालों की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आईआरएस अधिकारी अशोक अग्रवाल के लिए यह न्याय की एक बड़ी जीत मानी जा रही है।

