भारत में बहुप्रतीक्षित ‘जनगणना 2027’ की प्रक्रिया ने आधिकारिक तौर पर अपनी रफ्तार पकड़ ली है। गुरुवार से इस महाअभियान का पहला चरण शुरू हो गया है, जिसके तहत मुख्य रूप से ‘हाउसलिस्टिंग’ (मकानसूचीकरण) और ‘हाउसिंग जनगणना’ का फील्ड कार्य किया जा रहा है। सरकार द्वारा निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, यह महत्वपूर्ण चरण 15 मई 2026 तक जारी रहेगा। इस शुरुआती दौर में देश के 8 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल किया गया है, जिनमें कर्नाटक, ओडिशा, गोवा और सिक्किम जैसे राज्य शामिल हैं। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के भी प्रमुख हिस्सों जैसे नई दिल्ली नगरपालिका परिषद में यह कवायद आज से धरातल पर दिखाई देने लगी है।
इस जनगणना की सबसे बड़ी विशेषता इसका “डिजिटल अवतार” है। भारत के इतिहास में पहली बार इतने व्यापक स्तर पर अत्याधुनिक तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है, जिससे डेटा संग्रहण की सटीकता और गति में अभूतपूर्व वृद्धि होने की उम्मीद है। नागरिक अब सरकारी पोर्टल के माध्यम से स्वयं अपनी जानकारी दर्ज कर सकते हैं, जिसे ‘स्वयं-गणना’ (Self-Enumeration) का नाम दिया गया है। आंकड़ों के अनुसार, अब तक लगभग 12 लाख परिवार इस ऑनलाइन सुविधा का लाभ उठा चुके हैं। यह तकनीक न केवल समय की बचत कर रही है, बल्कि मानवीय त्रुटियों की संभावना को भी काफी हद तक कम कर रही है।
प्रशासनिक स्तर पर इस कार्य को सुचारू बनाने के लिए राज्यों को अलग-अलग समय सीमाओं में बांटा गया है। आज से ही हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में स्वयं-गणना की सुविधा सक्रिय कर दी गई है, जो 30 अप्रैल 2026 तक उपलब्ध रहेगी। वहीं, बिहार के निवासियों के लिए यह पोर्टल 17 अप्रैल से 1 मई 2026 तक खुलेगा। सरकार की योजना यह है कि पहले लोग डिजिटल रूप से अपनी जानकारी साझा करें और उसके बाद 1 मई से 30 मई के बीच गणना कर्मचारी घर-घर जाकर इस डेटा का भौतिक सत्यापन (Verification) करें, ताकि कोई भी परिवार छूट न जाए।
इस चरण के दौरान नागरिकों से कुल 33 प्रश्न पूछे जा रहे हैं। ये प्रश्न केवल जनसंख्या गिनने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि देश के सामाजिक-आर्थिक ढांचे को समझने के लिए तैयार किए गए हैं। इनमें घर की बनावट (कच्चा या पक्का), घर का स्वामित्व, पेयजल का स्रोत, बिजली की उपलब्धता, शौचालय की सुविधा और परिवार के पास मौजूद बुनियादी संपत्तियों जैसे संसाधन शामिल हैं। इन 33 सवालों के जवाबों से प्राप्त डेटा भविष्य में केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा बनाई जाने वाली विकास योजनाओं और कल्याणकारी नीतियों का मुख्य आधार बनेगा।
जनगणना प्रक्रिया में पारदर्शिता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ‘SE ID’ (स्वयं-गणना आईडी) की व्यवस्था की गई है। जिन परिवारों ने पोर्टल पर अपनी जानकारी भर दी है, उन्हें एक यूनिक आईडी प्रदान की जा रही है। जब प्रगणक (Enumerator) उनके घर पहुंचेंगे, तो उन्हें केवल यह आईडी दिखानी होगी, जिससे उनकी प्रक्रिया तुरंत पूरी हो जाएगी। हालांकि, सरकार ने उन लोगों के लिए पारंपरिक घर-घर सर्वे की व्यवस्था भी बरकरार रखी है जो तकनीक का उपयोग करने में सहज नहीं हैं, ताकि जनगणना में ‘अंत्योदय’ यानी अंतिम व्यक्ति की भागीदारी भी सुनिश्चित हो सके।

डेटा की सुरक्षा को लेकर उठने वाली चिंताओं पर विराम लगाते हुए सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह पूरी प्रक्रिया ‘जनगणना अधिनियम, 1948’ के कड़े प्रावधानों के तहत संचालित है। इसके अंतर्गत एकत्र की गई हर एक जानकारी पूरी तरह गोपनीय रखी जाएगी। यह डेटा किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई या अन्य व्यक्तिगत उद्देश्यों के लिए साझा नहीं किया जाएगा। इसका एकमात्र उद्देश्य सांख्यिकीय विश्लेषण करना है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि देश के किस क्षेत्र में किन सुविधाओं की कमी है और उन्हें कैसे दूर किया जाए।
अधिकारियों ने नागरिकों से इस राष्ट्रीय अभियान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने और प्रगणकों को सटीक जानकारी देने की पुरजोर अपील की है। जनगणना केवल एक सांख्यिकीय अभ्यास नहीं है, बल्कि यह देश के भविष्य की तस्वीर खींचने का जरिया है। सही आंकड़ों के अभाव में योजनाएं विफल हो सकती हैं, इसलिए सरकार चाहती है कि हर नागरिक अपनी सक्रिय भागीदारी निभाए। आने वाले हफ्तों में इस अभियान में और तेजी आने की उम्मीद है क्योंकि जैसे-जैसे पोर्टल पर पंजीकरण बढ़ेंगे, फील्ड कार्य का दायरा भी बढ़ता जाएगा।
अंततः, 2027 की यह जनगणना भारत को एक ‘स्मार्ट डेटा’ संपन्न राष्ट्र बनाने की दिशा में बड़ा कदम है। डिजिटल और पारंपरिक पद्धतियों का यह संगम यह सुनिश्चित करेगा कि सरकार के पास देश की बदलती जनसांख्यिकी का एक विश्वसनीय और आधुनिक डेटाबेस हो। 15 मई 2026 तक चलने वाला यह पहला चरण मुख्य जनगणना की नींव रखेगा, जो अंततः आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में सहायक सिद्ध होगा।

