छत्तीसगढ़ में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं के लिए साड़ी वितरण योजना में हुई गड़बड़ी अब एक बड़े प्रशासनिक और राजनीतिक विवाद का रूप ले चुकी है। महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा वर्ष 2024-25 के लिए वितरित की गई साड़ियों की गुणवत्ता मानकों से काफी नीचे पाई गई है। इसके बाद विभाग ने कड़ा फैसला लेते हुए वितरित की जा चुकी साड़ियों को वापस मंगाने और उन्हें बदलने के निर्देश जारी कर दिए हैं।
पूरे मामले की जड़ बजट और वास्तविक लागत के बीच का अंतर बताया जा रहा है। विभाग ने शुरुआत में प्रति साड़ी 500 रुपये की दर निर्धारित की थी, जिसमें 60 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार और 40 प्रतिशत हिस्सा राज्य सरकार द्वारा वहन किया जाना था। हालांकि, वितरण से पहले ही छत्तीसगढ़ खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड ने स्पष्ट कर दिया था कि गुणवत्तापूर्ण साड़ी की कीमत 718 रुपये से 860 रुपये के बीच होगी, लेकिन विभाग ने कम दर पर ही प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया।
शिकायतों का दौर तब शुरू हुआ जब प्रदेश की लगभग 1.94 लाख आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं तक ये साड़ियाँ पहुँचीं। कई जिलों से यह रिपोर्ट सामने आई कि सरकारी मापदंड के अनुसार साड़ी की लंबाई जो 5.5 मीटर होनी चाहिए थी, वह जमीनी स्तर पर मात्र 5 मीटर या उससे भी कम निकली। इसके अतिरिक्त, साड़ियों की बुनाई और कपड़े की गुणवत्ता भी तय मानकों के अनुरूप नहीं पाई गई, जिससे महिला कार्यकर्ताओं में भारी असंतोष फैल गया।
मामले की गंभीरता को देखते हुए 7 अप्रैल 2026 को महिला एवं बाल विकास विभाग ने एक नया आधिकारिक आदेश जारी किया। इस आदेश में विभाग ने स्वीकार किया कि राज्य स्तरीय समिति की जांच में साड़ियों की गुणवत्ता में विचलन और कम लंबाई की पुष्टि हुई है। विभाग ने अब सभी जिला अधिकारियों को निर्देशित किया है कि वे अपने क्षेत्रों में वितरित की गई दोषपूर्ण साड़ियों का तुरंत आकलन करें और उन्हें वापस जमा करें।
प्रशासन ने इस प्रक्रिया के लिए समय सीमा भी तय कर दी है। सभी जिलों को एक सप्ताह के भीतर रिपोर्ट सौंपने के लिए कहा गया है। विभाग ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि किसी जिले से समय पर जानकारी नहीं मिलती है, तो यह मान लिया जाएगा कि वहां वितरित साड़ियां सही हैं और भविष्य में किसी भी तरह के बदलाव या शिकायत पर विचार नहीं किया जाएगा। इससे स्थानीय प्रशासन पर दबाव बढ़ गया है कि वे जल्द से जल्द इस त्रुटि को सुधारें।
इस पूरे प्रकरण ने राज्य की राजनीति को भी गरमा दिया है। विपक्षी दल कांग्रेस ने इस मामले को लेकर सरकार पर निशाना साधा है और इसे भ्रष्टाचार या बड़ी प्रशासनिक लापरवाही करार देते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है। विपक्ष का तर्क है कि जब खादी बोर्ड ने पहले ही कम बजट पर असमर्थता जताई थी, तो फिर गुणवत्ता से समझौता किसके इशारे पर किया गया।

विभागीय मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े ने इस मुद्दे पर सफाई देते हुए कहा है कि सरकार आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने खुद साड़ियों की गुणवत्ता की जांच करने की बात कही और स्पष्ट किया कि जहां भी कमियां मिली हैं, वहां साड़ियों को बदला जाएगा। मंत्री ने आश्वासन दिया है कि नई साड़ियों की आपूर्ति अब फिर से छत्तीसगढ़ खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड के माध्यम से कराई जाएगी ताकि पारदर्शिता और गुणवत्ता बनी रहे।
फिलहाल, विभाग का पूरा ध्यान दोषपूर्ण साड़ियों के संग्रहण और नई खेप की व्यवस्था पर है। इस प्रशासनिक उलटफेर से न केवल सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ने की संभावना है, बल्कि यह भविष्य की सरकारी योजनाओं के लिए एक सबक भी है कि लागत कम करने के चक्कर में गुणवत्ता और सेवा प्रदाताओं की राय को नजरअंदाज करना कितना भारी पड़ सकता है।

