ईरान और अमेरिका के बीच चल रहा तनाव एक ऐसे नाजुक मोड़ पर पहुँच गया है, जहाँ युद्धविराम तो लागू है, लेकिन शांति की उम्मीदें बेहद कम नजर आ रही हैं। पाकिस्तान, जो पिछले कई दिनों से दोनों महाशक्तियों के बीच सुलह कराने का श्रेय लेने की कोशिश कर रहा था, उसकी कूटनीतिक कोशिशें धरी की धरी रह गई हैं। इस्लामाबाद में हुई हाई-प्रोफाइल वार्ता के विफल होने के बाद अब रूस ने इस वैश्विक संकट में अपनी सक्रिय भूमिका निभाने का संकेत दिया है।
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने रविवार को ईरान के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से फोन पर लंबी बातचीत की। क्रेमलिन द्वारा जारी बयान के अनुसार, पुतिन ने इस बात पर जोर दिया कि वे मिडिल ईस्ट में एक स्थायी और न्यायपूर्ण शांति स्थापित करने के लिए हर संभव कूटनीतिक मदद देने को तैयार हैं। रूस का यह कदम न केवल ईरान के साथ उसके मजबूत होते रिश्तों को दर्शाता है, बल्कि यह क्षेत्र में अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती देने की एक कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।
पाकिस्तान की मेजबानी में अमेरिका और ईरान के बीच चली 21 घंटे की मैराथन बैठक बिना किसी ठोस नतीजे के समाप्त हो गई। इस वार्ता में शामिल प्रतिनिधिमंडल किसी भी समझौते पर आम सहमति नहीं बना सके। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए एकमात्र राहत की बात यह रही कि बातचीत विफल होने के बावजूद दोनों देशों के बीच हुआ अस्थायी युद्धविराम अभी तक नहीं टूटा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह शांति “कांच की दीवार” की तरह है, जो किसी भी वक्त एक छोटी सी गलती से बिखर सकती है।
इस वार्ता की विफलता ने वैश्विक अर्थव्यवस्था, विशेष रूप से ऊर्जा क्षेत्र में हड़कंप मचा दिया है। यदि ईरान और अमेरिका के बीच संघर्ष दोबारा शुरू होता है, तो इसका सीधा असर खाड़ी देशों की तेल और गैस सुविधाओं पर पड़ेगा। बाजार विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि संघर्ष की स्थिति में कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं, जिससे दुनिया भर में महंगाई का नया दौर शुरू हो जाएगा। वैश्विक सप्लाई चेन के लिए खाड़ी क्षेत्र का सुरक्षित रहना अनिवार्य है, जो फिलहाल खतरे में नजर आ रहा है।
रूस ने इस पूरे विवाद के लिए सीधे तौर पर अमेरिका की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया है। पुतिन प्रशासन ने वाशिंगटन पर आरोप लगाया कि वह ईरान से एक ‘काल्पनिक खतरे’ का हौवा खड़ा कर रहा है ताकि वह अपनी राजनीतिक इच्छाओं को थोप सके। रूस ने अमेरिकी बयानों को ‘अमानवीय’ करार देते हुए कहा कि ईरानी नेतृत्व के खिलाफ वाशिंगटन की अपीलें अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मानकों के खिलाफ हैं। रूस पहले भी ईरान के परमाणु कार्यक्रम को युद्ध के बजाय बातचीत से सुलझाने की वकालत करता रहा है।
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, जिन्होंने पाकिस्तान में वार्ता का नेतृत्व किया था, अब स्वदेश लौट चुके हैं। उनके जाने से पहले दिए गए सख्त बयान ने तनाव को और बढ़ा दिया है। वेंस ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अमेरिका ने ईरान के सामने अपना ‘अंतिम और सबसे अच्छा’ प्रस्ताव रख दिया है। उन्होंने यह संदेश दिया कि अब गेंद ईरान के पाले में है और उसे ही तय करना है कि वह शांति का रास्ता चुनता है या संघर्ष का। अमेरिका का यह अल्टीमेटम बातचीत के दरवाजे बंद होने के संकेत दे रहा है।
दूसरी ओर, ईरान का रुख भी काफी कड़ा नजर आ रहा है। ईरानी संसद के अध्यक्ष कालिबाफ ने अमेरिकी पक्ष पर अविश्वास जताते हुए कहा कि ईरान ने कई रचनात्मक प्रस्ताव पेश किए थे, लेकिन अमेरिकी प्रशासन का रवैया सकारात्मक नहीं रहा। ईरान का मानना है कि अमेरिका उनकी शर्तों और संप्रभुता का सम्मान करने में विफल रहा है। इस अविश्वास की खाई ने कूटनीतिक समाधान की संभावनाओं को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया है।
फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें ईरान और अमेरिका के अगले कदम पर टिकी हैं। हालांकि सीजफायर के बाद से सीमा पर कोई बड़ी सैन्य कार्रवाई नहीं हुई है, लेकिन कूटनीतिक मोर्चे पर जारी यह ‘कोल्ड वॉर’ किसी भी समय एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध में तब्दील हो सकता है। रूस की सक्रियता और अमेरिका की सख्त चेतावनी के बीच मध्य पूर्व एक बार फिर बारूद के ढेर पर बैठा नजर आ रहा है, जहाँ शांति की डोर बेहद कमजोर हो चुकी है।

