भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने अंतरिक्ष में भारत की धाक जमाने की दिशा में एक और ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। गगनयान मिशन के तहत आयोजित किया गया दूसरा इंटीग्रेटेड एयर ड्रॉप टेस्ट (IADT-02) पूरी तरह सफल रहा। यह परीक्षण आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र में आयोजित किया गया, जिसका मुख्य उद्देश्य अंतरिक्ष यात्रियों की पृथ्वी पर सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करने वाले पैराशूट सिस्टम की जांच करना था।
इस परीक्षण के दौरान भारतीय वायुसेना के चिनूक हेलीकॉप्टर की मदद ली गई। लगभग 5.7 टन वजनी एक डमी क्रू मॉड्यूल को हेलीकॉप्टर के जरिए 3 किलोमीटर की ऊंचाई पर ले जाया गया और वहां से नीचे गिराया गया। जैसे ही कैप्सूल नीचे की ओर गिरा, उसके अत्याधुनिक पैराशूट सिस्टम ने बिल्कुल सटीक समय पर काम करना शुरू किया और कैप्सूल की गति को नियंत्रित करते हुए उसे समुद्र में सुरक्षित लैंड कर दिया।
तकनीकी दृष्टि से यह टेस्ट इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जब कोई अंतरिक्ष यान वायुमंडल में पुनः प्रवेश करता है, तो उसकी गति अत्यधिक तीव्र होती है। ऐसे में केवल एक भरोसेमंद पैराशूट सिस्टम ही यान की रफ्तार को कम कर उसे सुरक्षित लैंडिंग की स्थिति में ला सकता है। पिछले 8 महीनों में यह इस तरह का दूसरा परीक्षण है। इससे पहले 24 अगस्त 2025 को पहला सफल एयर ड्रॉप टेस्ट किया गया था, जो सिस्टम की निरंतरता को दर्शाता है।
केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने इस सफलता पर ISRO के वैज्ञानिकों को बधाई देते हुए इसे गगनयान मिशन का एक ‘महत्वपूर्ण मील का पत्थर’ बताया है। उन्होंने कहा कि भारत अब उन गिने-चुने देशों की सूची में शामिल होने के बेहद करीब है, जिनके पास मानव को अंतरिक्ष में भेजने और उन्हें सुरक्षित वापस लाने की स्वदेशी तकनीक मौजूद है। यह उपलब्धि न केवल तकनीकी ताकत को दर्शाती है, बल्कि अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत की ‘आत्मनिर्भरता’ का भी प्रतीक है।
गगनयान मिशन की योजना बेहद व्यवस्थित तरीके से बनाई गई है। साल 2027 में प्रस्तावित इस मुख्य मिशन से पहले ISRO कई चरणों में अपनी तैयारी की जांच करेगा। सबसे पहले दो खाली टेस्ट फ्लाइट्स अंतरिक्ष में भेजी जाएंगी, जिसके बाद तीसरी फ्लाइट में एक रोबोट को भेजा जाएगा ताकि परिस्थितियों का पूर्ण आकलन किया जा सके। इन सभी चरणों के सफल होने के बाद ही चौथी फ्लाइट में भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष की यात्रा पर रवाना किया जाएगा।
मुख्य मिशन के लिए भारतीय वायुसेना के चार जांबाज पायलटों का चयन किया जा चुका है। इन्हीं में से एक ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला हैं, जो हाल ही में अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) का दौरा भी कर चुके हैं। मिशन के दौरान तीन पायलटों को पृथ्वी से 400 किलोमीटर ऊपर की कक्षा में तीन दिनों के लिए भेजा जाएगा। इस पूरे मिशन की अनुमानित लागत लगभग 20,193 करोड़ रुपये है, जो भारत के अब तक के सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स में से एक है।
अंततः, यह परीक्षण इस बात का ठोस आश्वासन है कि भविष्य में भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों की वापसी महज एक सपना नहीं, बल्कि एक सुरक्षित हकीकत होगी। यह सफलता कल्पना चावला जैसी त्रासदियों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ISRO की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। अब पूरी दुनिया की नजरें साल के अंत में होने वाली पहली टेस्ट फ्लाइट पर टिकी हैं, जो भारत के ‘स्पेस पावर’ बनने के सफर को नई ऊंचाई देगी।

