भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार ने एक निर्णायक कदम उठाया है। ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित करने वाले ऐतिहासिक संविधान संशोधन बिल को मंजूरी दे दी गई है। सूत्रों के अनुसार, इस महत्वपूर्ण विधेयक को 16 अप्रैल से शुरू होने वाले संसद के विशेष सत्र में पेश किया जाएगा, जिससे देश के विधायी ढांचे में एक बड़ा बदलाव आने की उम्मीद है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस कानून के कार्यान्वयन को लेकर स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि यह आरक्षण 2029 के लोकसभा चुनाव से पूर्ण रूप से प्रभावी होगा। हाल ही में असम के बारपेटा में एक जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने जोर दिया कि देश की महिलाएं पिछले चार दशकों से इस अधिकार की प्रतीक्षा कर रही थीं। पीएम मोदी ने इसे ‘विकसित भारत’ के निर्माण के लिए अनिवार्य बताया और कहा कि राजनीति में महिलाओं की मजबूत उपस्थिति राष्ट्र को नई दिशा प्रदान करेगी।
इस अधिनियम को जमीन पर उतारने के लिए ‘परिसीमन’ (Delimitation) की प्रक्रिया एक मुख्य शर्त होगी। सरकार ने स्पष्ट किया है कि 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर एक परिसीमन आयोग का गठन किया जाएगा। यह आयोग सीटों के नए सिरे से निर्धारण का कार्य करेगा, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि आरक्षण का लाभ हर वर्ग और क्षेत्र की महिलाओं तक न्यायपूर्ण तरीके से पहुँच सके।
विधेयक के लागू होने के साथ ही संसद के स्वरूप में भी विस्तार देखा जा सकता है। वर्तमान में लोकसभा में 543 सीटें हैं, जिन्हें बढ़ाकर 816 तक किए जाने का प्रस्ताव है। इस रणनीतिक विस्तार का उद्देश्य यह है कि मौजूदा राजनीतिक संतुलन को बिगाड़े बिना महिलाओं के लिए पर्याप्त सीटें सृजित की जा सकें। इस मॉडल के तहत पुरानी सीटों को प्रभावित किए बिना नई सीटें जोड़ी जाएंगी, जिससे भविष्य की राजनीतिक चुनौतियों का समाधान भी संभव हो सकेगा।
महिला सशक्तिकरण को सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता बताते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि नीति-निर्धारण में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी से लोकतंत्र और अधिक समावेशी बनेगा। यह कानून न केवल महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाएगा, बल्कि सामाजिक न्याय की दिशा में भी एक मील का पत्थर साबित होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों की महिलाओं के लिए राजनीति के मुख्य मंच पर आने के द्वार खुलेंगे।
अब पूरे देश की नजरें 16 अप्रैल से आयोजित होने वाले संसद के विशेष सत्र पर टिकी हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह बिल सुगमता से पारित हो जाता है, तो यह भारतीय संसदीय इतिहास का सबसे बड़ा सुधार माना जाएगा। इस सत्र में होने वाली चर्चा और उसके परिणाम यह तय करेंगे कि भारतीय राजनीति में महिलाओं की सक्रिय और सशक्त भागीदारी का नया अध्याय कितनी जल्दी शुरू होता है।

