छत्तीसगढ़ की राजनीति को हिला देने वाले ऐतिहासिक राम अवतार जग्गी हत्याकांड में 21 साल बाद छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक बड़ा और निर्णायक फैसला सुनाया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की खंडपीठ ने निचली अदालत के पुराने फैसले को पलटते हुए राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पुत्र अमित जोगी को हत्या और आपराधिक साजिश का दोषी पाया है। कोर्ट ने इस मामले में सीबीआई की अपील को स्वीकार करते हुए न्याय के सिद्धांतों को सर्वोपरि रखा है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में अमित जोगी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 और 120-बी के तहत दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही उन पर 1,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है, जिसे अदा न करने पर उन्हें अतिरिक्त छह महीने की सश्रम कारावास काटनी होगी। कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि उन्हीं सबूतों और गवाहियों के आधार पर, जिनसे अन्य आरोपियों को सजा मिली, मुख्य साजिशकर्ता को बरी करना कानूनी रूप से पूरी तरह गलत था।
यह पूरा मामला 4 जून 2003 का है, जब राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के तत्कालीन कोषाध्यक्ष राम अवतार जग्गी की रायपुर में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। जग्गी उस समय के दिग्गज नेता विद्याचरण शुक्ल के बेहद करीबी माने जाते थे। इस हत्याकांड में कुल 31 लोगों को आरोपी बनाया गया था, जिनमें से दो सरकारी गवाह बन गए थे। साल 2007 में रायपुर की विशेष अदालत ने 28 आरोपियों को तो सजा दी थी, लेकिन अमित जोगी को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था।
निचली अदालत के इसी फैसले को राम अवतार जग्गी के पुत्र सतीश जग्गी ने चुनौती दी थी। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जिसके निर्देश पर हाईकोर्ट में केस को फिर से खोला गया और सुनवाई शुरू हुई। सतीश जग्गी का शुरू से ही आरोप था कि सत्ता के प्रभाव के कारण मुख्य साजिशकर्ता को बचाने का प्रयास किया गया था, जिसे अब हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणियों में सही माना है।
हाईकोर्ट के इस फैसले के तुरंत बाद अमित जोगी ने राहत के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल की है, जिस पर जल्द सुनवाई होने की उम्मीद है। अमित जोगी के वकीलों का तर्क है कि उनके खिलाफ ठोस सबूत नहीं हैं, जबकि पीड़ित पक्ष इसे सत्य की जीत बता रहा है।
इस फैसले ने छत्तीसगढ़ की सियासी सरगर्मी बढ़ा दी है। 21 वर्षों के बाद आए इस निर्णय ने यह साबित कर दिया है कि न्याय प्रक्रिया में देरी भले ही हो, लेकिन कानून की नजर में कोई भी व्यक्ति पद या कद से ऊपर नहीं होता। अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं कि क्या अमित जोगी को वहां से कोई अंतरिम राहत मिलती है या उन्हें जेल जाना पड़ेगा।

