पश्चिम एशिया के तनावपूर्ण माहौल में अब एक नया और भयावह खतरा मंडरा रहा है—डिजिटल युद्ध। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष बढ़ता है, तो ईरान सामरिक रूप से महत्वपूर्ण ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) में बिछी समुद्री इंटरनेट केबल्स को निशाना बना सकता है। यह कदम न केवल संचार व्यवस्था को ठप कर देगा, बल्कि पूरी दुनिया की डिजिटल अर्थव्यवस्था की नींव हिला सकता है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को अक्सर तेल की आपूर्ति के लिए ‘दुनिया की गर्दन’ कहा जाता है, क्योंकि यहाँ से विश्व का 20% कच्चा तेल गुजरता है। लेकिन इसके समुद्र तल के नीचे फाइबर ऑप्टिक केबल्स का एक विशाल जाल भी बिछा है। यह जाल एशिया, यूरोप और अफ्रीका के बीच डेटा के आदान-प्रदान के लिए मुख्य राजमार्ग की तरह काम करता है। यदि इन केबल्स को नुकसान पहुँचता है, तो वैश्विक कनेक्टिविटी का एक बड़ा हिस्सा पल भर में अंधकार में डूब सकता है।
ईरान की यह धमकी इसलिए भी गंभीर है क्योंकि दुनिया का करीब 97% इंटरनेट ट्रैफिक इन्हीं अंडरसी केबल्स के माध्यम से गुजरता है। आम धारणा के विपरीत, इंटरनेट सैटेलाइट के बजाय इन पतली फाइबर केबल्स पर टिका है। ईरान रेड सी और होर्मुज जैसे ‘चोकप्वाइंट्स’ का फायदा उठाकर इंटरनेट ब्लैकआउट कर सकता है। रेड सी में पहले भी केबल्स को नुकसान पहुँचा है, जिन्हें युद्ध क्षेत्र होने के कारण रिपेयर करने में महीनों का समय लगा था।
भारत के लिए यह खतरा विशेष रूप से चिंताजनक है। भारत का अधिकांश डेटा ट्रैफिक SEA-ME-WE और AAE-1 जैसे केबल सिस्टम के जरिए आता है। यदि ये केबल्स काटी जाती हैं, तो भारत का करीब $250 बिलियन (23.48 लाख करोड़ रुपये) का विशाल IT और आउटसोर्सिंग सेक्टर सीधे तौर पर प्रभावित होगा। अमेरिकी और यूरोपीय कंपनियों के लिए काम करने वाले लाखों भारतीयों की रियल-टाइम कनेक्टिविटी टूट जाएगी, जिससे अरबों डॉलर का नुकसान हो सकता है।
आर्थिक मोर्चे पर, बैंकिंग और वित्तीय सेवाएं सबसे पहले प्रभावित होंगी। अंतरराष्ट्रीय फंड ट्रांसफर के लिए इस्तेमाल होने वाला SWIFT नेटवर्क धीमा या ठप पड़ सकता है। इसके अलावा, भारत का स्टॉक मार्केट और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म भी भारी लेटेंसी (डेटा देरी) का शिकार होंगे। डिजिटल इंडिया के इस दौर में, जहाँ छोटे से छोटा भुगतान भी ऑनलाइन होता है, इंटरनेट की धीमी गति पूरे देश में अफरा-तफरी की स्थिति पैदा कर सकती है।
तकनीकी रूप से, केबल कटने पर डेटा को ‘पैसिफिक रूट’ के जरिए डायवर्ट करना पड़ेगा। इसका सीधा असर इंटरनेट की स्पीड पर पड़ेगा। यूट्यूब, नेटफ्लिक्स और इंस्टाग्राम जैसे मनोरंजन ऐप्स पर बफरिंग बढ़ जाएगी, और वीडियो कॉलिंग की गुणवत्ता इतनी गिर जाएगी कि पेशेवर बातचीत करना असंभव हो जाएगा। डेटा को लंबी दूरी तय करनी होगी, जिससे लेटेंसी (डेटा ट्रैवल टाइम) बढ़ जाएगी और क्लाउड सर्विसेज बाधित हो जाएंगी।

दिलचस्प बात यह है कि ईरान ने इस स्थिति के लिए खुद को सुरक्षित कर लिया है। ईरान ने अपना खुद का नेशनल इंफॉर्मेशन नेटवर्क (NIN) तैयार किया है। यह एक तरह का ‘घरेलू इंटरनेट’ है, जो वैश्विक केबल्स कटने के बाद भी ईरान के भीतर बैंकिंग और सरकारी सेवाओं को चालू रखेगा। यानी ईरान दुनिया का इंटरनेट काटकर खुद को सुरक्षित रखते हुए दूसरों को भारी आर्थिक चोट पहुँचा सकता है।
भारत में विशेषज्ञ अब वैकल्पिक रास्तों की तलाश की वकालत कर रहे हैं। हालांकि एलन मस्क की स्टारलिंक (Starlink) जैसी सैटेलाइट इंटरनेट सेवाएं एक बैकअप हो सकती हैं, लेकिन वे अभी इतनी सक्षम नहीं हैं कि पूरे देश के विशाल डेटा लोड को संभाल सकें। भविष्य में ऐसी केबल्स बिछाने की योजनाएं बनाई जा रही हैं जो संवेदनशील खाड़ी क्षेत्रों को बायपास कर सकें, लेकिन इसमें वर्षों का समय और भारी निवेश लगेगा।
अंततः, यह केवल दो देशों के बीच का युद्ध नहीं रह गया है, बल्कि यह एक वैश्विक हाइब्रिड वॉर का संकेत है। होर्मुज में बढ़ता तनाव यह साबित करता है कि आधुनिक युग में फिजिकल बॉर्डर से ज्यादा डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर नाजुक है। भारत सहित वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए यह समय अपनी डिजिटल सुरक्षा और कनेक्टिविटी के विकल्पों को फिर से परखने का है, ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति में देश का आर्थिक चक्का न थमे।

