अमेरिका-इजरायल के साथ ईरान की जंग के लगातार बढ़ते रहने से दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध की दहलीज पर खड़ा कर दिया है. परमाणु युद्ध के एक्सपर्ट्स और एक नई वैज्ञानिक स्टडी के अनुसार अगर दुनिया भर की 12 हजार न्यूक्लिअर मिसाइलों का इस्तेमाल होता है, तो लगभग 5 अरब लोग मारे जाएंगे और पूरी धरती न्यूक्लिअर विंटर यानी ‘परमाणु शीत’ की चपेट में आ जाएगी. दुनिया में 10 साल तक बर्फ की बरसात होगी. एक अनुमान के अनुसार दुनिया में अगर परमाणु जंग हो गई तो केवल दो ऐसे देश हैं, जो बचे रहेंगे लेकिन वहां भी जीवन आसान कतई नहीं होगा.
प्रसिद्ध शोध पत्रिका ‘नेचर’ में प्रकाशित एक पीयर-रिव्यूड स्टडी और एक्सपर्ट्स के दावों के अनुसार भीषण परमाणु युद्ध के बावजूद ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड ही ऐसे दो देश होंगे, जो जीवित रहने में सक्षम हो सकते हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण ये देश परमाणु शीत की मार झेलने के बावजूद खेती कर पाने में सक्षम रहेंगे।
इस युद्ध से बचने वाले वे दो मुख्य देश – ऑस्ट्रेलिया (Australia) इसकी भौगोलिक स्थिति और विशाल कृषि क्षेत्र इसे परमाणु विकिरण और भुखमरी से बचने के लिए सबसे सुरक्षित स्थान बनाते हैं। न्यूजीलैंड (New Zealand): यह भी अपने पृथक स्थान और स्थानीय खाद्य उत्पादन क्षमता के कारण जीवित रहने वाले देशों की सूची में शामिल है।
100 मिलियन डिग्री तापमान और ‘ब्लैकआउट’ –
‘न्यूक्लियर वॉर: ए सिनेरियो’ की लेखिका और आर्मगेडन विशेषज्ञ एनी जैकबसन ने चेतावनी दी है कि परमाणु विस्फोटों से निकलने वाले आग के गोले 100 मिलियन डिग्री सेल्सियस तक गर्म हो सकते हैं. ‘द डायरी ऑफ अ सीईओ’ पॉडकास्ट पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि शुरुआती धमाकों में करोड़ों की संख्या में लोग मारे जाएंगे लेकिन असली तबाही तो उसके बाद ही आएगी. आयोवा और यूक्रेन जैसे कृषि प्रधान इलाके वातावरण में जमा कालिख और धुएं के कारण सूरज की रोशनी धरती तक नहीं पहुँच पाएगी, जिससे तापमान शून्य से नीचे गिर जाएगा। लगभग 10 वर्षों तक खेती संभव नहीं होगी और भारी हिमपात जैसी स्थिति बनी रहेगी। जब खेती पूरी तरह विफल हो जाएगी, तो लोग भूख से मरेंगे.’
जैकबसन के अनुसार, ओजोन परत को होने वाले नुकसान और रेडिएशन के कारण स्थिति और भयावह होगी. ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में लोग जीवित तो रहेंगे, लेकिन उन्हें अंधेरे में रहना होगा, वहां भी भोजन के लिए संघर्ष होगा और जीवन पूरी तरह से बदल जाएगा। हालांकि शेष दुनिया से दूरी और समुद्र का प्रभाव तापमान में भयंकर गिरावट से कुछ हद तक बचने में कामयाबी मिलेगी.

