राजधानी दिल्ली समेत देश के कई बड़े शहरों में पुराना डीजल वाहन चलाना आने वाले दिनों में आसान हो सकता है। बढ़ती प्रदूषण की समस्या से निपटने और वाहन चालकों को राहत देने के लिए केंद्र सरकार एक नई तकनीक को हरी झंडी दिखाने की तैयारी में है, जो पुरानी गाड़ियों के प्रदूषण स्तर को काफी हद तक नियंत्रित कर सकती है।
इस दिशा में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) दिल्ली ने एक बेहद खास और किफायती तकनीक विकसित की है। इस डिवाइस का नाम रेट्रोफिट एमिशन कंट्रोल डिवाइस (RECD) रखा गया है, जिसे पुरानी डीजल गाड़ियों के एग्जॉस्ट सिस्टम में आसानी से फिट किया जा सकता है। यह तकनीक पर्यावरण के लिहाज से एक बड़ा कदम साबित हो सकती है।
दावा किया जा रहा है कि यह डिवाइस धुएं के साथ निकलने वाले हानिकारक पार्टिकुलेट मैटर (PM) को 90 फीसदी तक रोक सकती है। इसके साथ ही यह नाइट्रोजन ऑक्साइड के स्तर को भी करीब 60 फीसदी तक कम करने में सक्षम है, जो वायु प्रदूषण का एक मुख्य कारक माना जाता है।
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने इस तकनीक का समर्थन करते हुए कहा है कि यदि इस डिवाइस को बीएस-III या बीएस-IV मानक वाली पुरानी गाड़ियों में लगा दिया जाए, तो वे काफी हद तक बीएस-VI मानकों के बराबर स्वच्छ रूप से काम करने लगेंगी।
इस तकनीक के आने से वाहन मालिकों को अपनी पुरानी गाड़ियों को जबरन कबाड़ (स्क्रैप) में देने की अनिवार्यता से बड़ी राहत मिल सकती है। कमर्शियल या निजी गाड़ियां बदलने से आम आदमी की जेब पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है, जिससे बचने में यह डिवाइस मददगार साबित होगी।
खास बात यह है कि इस तकनीक की अनुमानित कीमत बहुत कम रहने वाली है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बाजार में यह डिवाइस महज 4,000 से 5,000 रुपये के बीच उपलब्ध हो सकती है, जिसे आम जनता आसानी से वहन कर सकती है। इस डिवाइस का उपयोग केवल वाहनों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसे डीजल जनरेटरों में भी इस्तेमाल किया जा सकेगा।
सरकार जल्द ही ऑटोमोटिव इंडस्ट्री स्टैंडर्ड 228 के तहत इस संबंध में ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी कर सकती है। यदि यह प्रायोगिक पहल व्यापक स्तर पर सफल होती है, तो वाहन चालकों और पर्यावरण दोनों के लिए यह एक दूरगामी और सकारात्मक बदलाव साबित होगा।

