सुप्रीम कोर्ट ने सड़क हादसों में मिलने वाले मुआवजे और बीमा नियमों को लेकर केंद्र सरकार से एक बहुत ही महत्वपूर्ण और तीखा सवाल किया है। अदालत ने पूछा है कि यदि किसी सड़क हादसे में शामिल वाहन का बीमा (Insurance) नहीं है, तो उसके पीड़ितों को अंतरिम मुआवजे के दायरे से बाहर क्यों रखा गया है? यह सवाल देश की न्याय व्यवस्था और सड़क सुरक्षा से जुड़े कानूनों में एक बड़े सुधार की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
यह पूरा मामला सड़क दुर्घटना पीड़ितों के लिए लाई गई ‘कंपनसेशन टू विक्टिम्स (इंटरिम रिलीफ) स्कीम, 2026’ [Compensation to Victims (Interim Relief) Scheme, 2026] की समीक्षा के दौरान सामने आया। सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन शामिल हैं, इस योजना के विभिन्न पहलुओं और उसके दायरे का अध्ययन कर रही थी। अदालत का मानना है कि राहत देने के नियम ऐसे होने चाहिए जो हर पीड़ित तक आसानी से पहुंच सकें।
समीक्षा के दौरान अदालत ने पाया कि इस प्रस्तावित योजना के तहत मिलने वाली अंतरिम राहत मुख्य रूप से केवल उन मामलों तक सीमित प्रतीत होती है, जहां दुर्घटना करने वाला वाहन बीमित (Insured) था। इस स्थिति पर गहरी चिंता जताते हुए अदालत ने कहा कि यदि किसी वाहन का बीमा नहीं है, तो क्या इसका मतलब यह है कि उस हादसे के पीड़ित को कोई फौरी राहत नहीं मिलेगी?
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि देश की सड़कों पर बड़ी संख्या में ऐसे वाहन चलते हैं जिनका बीमा या तो खत्म हो चुका होता है या वे पूरी तरह से अनइंस्योर्ड होते हैं। ऐसे मामलों में जब कोई गरीब या आम व्यक्ति सड़क हादसे का शिकार होता है, तो उसका परिवार पहले से ही सदमे और आर्थिक तंगी में होता है। यदि गाड़ी का बीमा न होने के कारण उन्हें तुरंत मुआवजा नहीं मिलता, तो उनकी मुश्किलें और बढ़ जाती हैं।
वर्तमान व्यवस्था के तहत, बीमा रहित वाहनों से होने वाली दुर्घटनाओं के पीड़ितों को मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) के समक्ष लंबी और जटिल कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है। इसमें कई साल लग जाते हैं, जिससे न्याय मिलने में भारी देरी होती है। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि अंतरिम राहत का मुख्य उद्देश्य ही पीड़ित परिवार को तुरंत संबल देना है, न कि उन्हें कागजी और कानूनी प्रक्रियाओं में उलझाए रखना।
इस योजना के तहत सड़क दुर्घटना में मौत होने पर 2 लाख रुपये और गंभीर रूप से घायल होने पर 1 लाख रुपये की अंतरिम आर्थिक सहायता दिए जाने का प्रावधान किया गया है। लेकिन बिना बीमा वाले वाहनों के मामलों में स्थिति स्पष्ट न होने के कारण, अदालत ने सरकार से जवाब तलब किया है कि वह ऐसे पीड़ितों को राहत देने के लिए क्या कदम उठा रही है।
अंत में, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह इस योजना के दायरे और प्रचार-प्रसार पर ध्यान दे तथा यह स्पष्ट करे कि बीमा रहित वाहनों से होने वाले हादसों के पीड़ितों को समय पर न्याय और मुआवजा दिलाने के लिए सरकार के पास क्या वैकल्पिक व्यवस्था है। अब इस मामले में केंद्र सरकार के जवाब और रुख पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।

