रायपुर/बलौदाबाजार, 30 अप्रैल 2026: छत्तीसगढ़ के प्रमुख पर्यटन केंद्रों में शुमार बारनवापारा वन्यजीव अभयारण्य ने इस वर्ष पड़ रही भीषण गर्मी के बीच वन्यजीव संरक्षण की एक नई मिसाल पेश की है। जब पारा लगातार बढ़ रहा है और जंगलों के प्राकृतिक जल स्रोत सूखने की कगार पर हैं, तब बलौदाबाजार वनमंडल द्वारा लागू की गई ‘वैज्ञानिक जल प्रबंधन प्रणाली’ बेजुबान जानवरों के लिए जीवनदायिनी साबित हो रही है। इस मॉडल की सबसे खास बात यह है कि इसे केवल तात्कालिक राहत के लिए नहीं, बल्कि डेटा और रिसर्च के आधार पर तैयार किया गया है।
अभयारण्य प्रबंधन ने पूरे क्षेत्र का सूक्ष्म मानचित्रण (Mapping) कर 240 से अधिक जल स्रोतों को सक्रिय किया है। रणनीति इस प्रकार तैयार की गई है कि वन्यप्राणियों को पानी की तलाश में मीलों का सफर न करना पड़े। अधिकारियों के अनुसार, अभयारण्य के भीतर प्रत्येक 5 वर्ग किलोमीटर के दायरे में पानी की उपलब्धता सुनिश्चित की गई है। इसमें प्राकृतिक तालाबों और स्टॉप डैम्स के साथ-साथ विशेष रूप से निर्मित ‘कृत्रिम सॉसर’ (पानी के कुंड) भी शामिल हैं, जो वन्यजीवों की प्यास बुझाने में सहायक हो रहे हैं।
बारनवापारा का यह मॉडल केवल पानी भरने की पारंपरिक व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह ‘स्मार्ट’ और डिजिटल है। प्रबंधन ने सभी जल स्रोतों की जियो-टैगिंग (Geo-tagging) की है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि मुख्यालय में बैठे अधिकारी भी रीयल-टाइम में यह देख सकते हैं कि किस क्षेत्र में कितने जल स्रोत हैं और उनकी वर्तमान स्थिति क्या है। इस तकनीक ने निगरानी प्रणाली को पारदर्शी और अधिक प्रभावी बना दिया है।
सटीक प्रबंधन के लिए ‘स्टाफ गेज’ तकनीक का सहारा लिया जा रहा है। प्रत्येक 15 दिनों में जल स्तर का वैज्ञानिक आकलन किया जाता है। जल स्रोतों को उनके जल स्तर के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया है। इससे विभाग को यह पहले ही पता चल जाता है कि अगले कुछ दिनों में कहाँ पानी कम होने वाला है, जिससे संकट आने से पहले ही वहां टैंकरों या अन्य माध्यमों से जलापूर्ति सुनिश्चित कर दी जाती है।

विभाग ने केवल पानी की मात्रा पर ही नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता पर भी विशेष ध्यान दिया है। वन्यजीवों के स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए नियमित अंतराल पर पानी के pH मान और TDS (Total Dissolved Solids) की जांच की जा रही है। यह सुनिश्चित किया जाता है कि पानी न केवल उपलब्ध हो, बल्कि वह वन्यजीवों के पीने के लिए सुरक्षित और स्वास्थ्यवर्धक भी हो। जिन दुर्गम इलाकों में प्राकृतिक स्रोत पूरी तरह सूख चुके हैं, वहां विभाग टैंकरों के जरिए निरंतर सेवा दे रहा है।
गर्मी के मौसम में वन्यजीवों में होने वाले ‘हीट स्ट्रेस’ (गर्मी के तनाव) को कम करने के लिए एक और नवाचार किया गया है। जल स्रोतों के पास रणनीतिक रूप से ‘साल्ट लिक’ (Salt Licks) यानी नमक और खनिजों की डलियाँ स्थापित की गई हैं। वन्यजीव पानी पीने के बाद इन साल्ट लिक्स के माध्यम से आवश्यक खनिज प्राप्त कर रहे हैं। यह उनके शारीरिक संतुलन को बनाए रखने और डिहाइड्रेशन से लड़ने में काफी मददगार साबित हो रहा है।
अभयारण्य प्रबंधन की इस सक्रियता का सकारात्मक असर मैदानी स्तर पर दिखने लगा है। पानी और भोजन की पर्याप्त उपलब्धता के कारण वन्यजीवों के रिहायशी इलाकों की ओर पलायन करने की घटनाओं में कमी आई है। साथ ही, पानी के स्रोतों के पास वन्यप्राणियों की उपस्थिति और उनकी गतिविधियों में भी स्वस्थ वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वे इस कृत्रिम लेकिन वैज्ञानिक व्यवस्था को सहजता से अपना चुके हैं।
वनमंडलाधिकारी ने इस सफलता पर जोर देते हुए कहा कि यह प्रणाली भविष्य के वन्यजीव प्रबंधन के लिए एक मानक (Standard) स्थापित कर रही है। उन्होंने विश्वास जताया कि वैज्ञानिक डेटा और निरंतर निगरानी के मेल से विकसित यह जवाबदेह मॉडल न केवल वर्तमान गर्मी के संकट को टालेगा, बल्कि दीर्घकालिक संरक्षण की दिशा में भी मील का पत्थर साबित होगा। बारनवापारा की यह पहल अब छत्तीसगढ़ के अन्य अभयारण्यों के लिए भी एक अनुकरणीय उदाहरण बन गई है।

