फ्रांस, इटली और स्पेन समेत यूरोप के कई प्रमुख देशों में हाल ही में बड़े पैमाने पर हिंसक प्रदर्शन देखने को मिले हैं। इन विरोध प्रदर्शनों में लाखों की संख्या में आम नागरिक, छात्र, पेंशनभोगी और विभिन्न ट्रेड यूनियन से जुड़े लोग सड़कों पर उतरे हैं। प्रदर्शनकारियों का यह जनसैलाब मुख्य रूप से बढ़ती महंगाई, जीवन-यापन के भारी खर्च, आवास संकट और सरकारी नीतियों के खिलाफ अपनी नाराजगी जाहिर कर रहा है।
फ्रांस में यह जन-असंतोष बेहद उग्र रूप ले चुका है, जहां पेरिस और मार्सिले जैसे बड़े शहरों में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच तीखी झड़पें हुईं। प्रदर्शनकारियों ने कई जगहों पर पथराव और आगजनी की, जिसके जवाब में पुलिस को आंसू गैस के गोले, वॉटर कैनन और स्टन ग्रेनेड का इस्तेमाल करना पड़ा। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, देश भर में करीब 4.10 लाख लोगों ने इन रैलियों में हिस्सा लिया, जबकि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए लगभग 70,000 सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया था। हिंसा और तोड़फोड़ की घटनाओं के बीच पुलिस ने देश भर से लगभग 1,000 लोगों को हिरासत में लिया है।
दूसरी ओर, इटली के मिलान, रोम, ट्यूरिन और नेपल्स जैसे प्रमुख शहरों में भी हालात काफी तनावपूर्ण बने हुए हैं। वहां युवा समूहों और आम नागरिकों ने सामाजिक और आर्थिक मुद्दों को लेकर उग्र मार्च निकाले, जिसके दौरान कुछ स्थानों पर दुकानों में तोड़फोड़ और लूटपाट की घटनाएं भी सामने आईं। मिलान के प्रसिद्ध फैशन हब में सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने और निजी संपत्तियों को बचाने के लिए कई दुकानों की खिड़कियों पर लकड़ी के सुरक्षा बोर्ड लगाने पड़े। प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी की सरकार ने स्थिति पर काबू पाने के लिए अकेले मिलान में ही 500 अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती के आदेश दिए हैं।
स्पेन की राजधानी मैड्रिड और बार्सिलोना जैसे शहरों में भी हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतरे। स्पेन में इन प्रदर्शनों का मुख्य केंद्र बिंदु बढ़ती महंगाई के साथ-साथ गंभीर पेंशन संकट और आवास की आसमान छूती कीमतें रहा है। प्रदर्शनकारी सार्वजनिक पेंशन प्रणाली को मजबूत करने, महंगाई के अनुपात में पेंशन बढ़ाने तथा किराए और मकानों की कीमतों पर लगाम लगाने की पुरजोर मांग कर रहे हैं, जिससे सरकार पर भारी दबाव बन गया है।
यूरोप के अन्य हिस्सों जैसे पुर्तगाल और अल्बानिया में भी इसी तरह का असंतोष फूट पड़ा है। पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन में आवास संकट और महंगे मकानों के खिलाफ लोगों ने सड़कों पर प्रदर्शन किया और चौराहों पर टेंट लगाकर विरोध जताया, जिन्हें बाद में पुलिस ने वहां से हटाया। वहीं, अल्बानिया के तिराना में छात्रों और नागरिकों ने भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था की बदहाली के खिलाफ उग्र प्रदर्शन करते हुए सरकारी इमारतों को निशाना बनाया।
विश्लेषकों का मानना है कि यूरोप के इन देशों में सुस्त आर्थिक वृद्धि और बुनियादी जरूरतों के महंगे होने से आम जनता का सब्र टूट रहा है। जीवन-यापन का बढ़ता खर्च और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ा असंतोष इन व्यापक आंदोलनों की मुख्य वजह बनता जा रहा है। इसके अलावा, कई देशों में आने वाले राजनीतिक घटनाक्रमों और चुनावों ने भी इस जन-आक्रोश को और अधिक हवा दी है, जिससे यूरोपीय सरकारों के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।

