लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने आईडीबीआई बैंक (IDBI Bank) में केंद्र सरकार और एलआईसी (LIC) की हिस्सेदारी बेचने के फैसले का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने बैंक के कर्मचारियों को एक खुला पत्र लिखकर अपना समर्थन जताया है और सरकार की नीतियों पर तीखे सवाल उठाए हैं। अपने सोशल मीडिया पोस्ट में उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि कांग्रेस शासनकाल में देश के विकास के लिए बैंक बनाए जाते थे, जबकि मौजूदा सरकार के कार्यकाल में उन्हें बेचा जा रहा है।
इस पूरी प्रक्रिया के तहत केंद्र सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) मिलकर आईडीबीआई बैंक में अपनी बहुलांश हिस्सेदारी बेचने जा रहे हैं। वर्तमान में इस बैंक में सरकार और एलआईसी की कुल मिलाकर लगभग 95 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जो इस प्रस्तावित बिक्री के बाद घटकर केवल 34 प्रतिशत रह जाएगी। इस कदम से बैंक का नियंत्रण निजी हाथों (कनाडा की कंपनी फेयरफैक्स) में चला जाएगा, जिसका बैंक यूनियनों द्वारा लंबे समय से विरोध किया जा रहा है।
राहुल गांधी ने बैंक के कर्मचारियों की मेहनत और उसकी शानदार वित्तीय वापसी की सराहना की है। उन्होंने कहा कि जो बैंक कुछ साल पहले तक घाटे में चल रहा था, उसने कर्मचारियों के कड़े परिश्रम के बल पर शानदार रिकवरी करते हुए पिछले साल 9,000 करोड़ रुपये से अधिक का शुद्ध मुनाफा कमाया है। ऐसे में मुनाफे में चल रहे संस्थान को निजी हाथों में सौंपना पूरी तरह से अनुचित है।
अपने पत्र में राहुल गांधी ने वर्ष 2003 में संसद में दिए गए उस आश्वासन का भी जिक्र किया, जिसमें सरकार ने कहा था कि वह आईडीबीआई बैंक में कम से कम 51 प्रतिशत हिस्सेदारी अपने पास बनाए रखेगी। उन्होंने तर्क दिया कि संसद में दिया गया यह वादा देश की जनता के साथ किया गया वादा था, जिसे तोड़ा जा रहा है।
निजीकरण के बाद कर्मचारियों के भविष्य पर मंडरा रहे खतरे को लेकर भी राहुल गांधी ने गहरी चिंता जताई है। उन्होंने आशंका जताई कि बैंक के निजी हाथों में जाने से अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के आरक्षण से जुड़े सुरक्षा प्रावधान खत्म हो सकते हैं। साथ ही, कर्मचारियों की सेवा शर्तें और नौकरियां भी असुरक्षित हो जाएंगी।
अंत में, कांग्रेस नेता ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक धन से खड़े किए गए बैंक बेचने के लिए नहीं होते, बल्कि वे देश के आर्थिक और सामाजिक निर्माण के मजबूत साधन हैं। उन्होंने आईडीबीआई बैंक के कर्मचारियों को एकजुट रहकर अपने अधिकारों के लिए लड़ने का आह्वान किया और भरोसा दिलाया कि वे इस संघर्ष में पूरी तरह उनके साथ खड़े हैं।

