ईरान के शीर्ष नेतृत्व की ओर से एक बेहद कड़ा और स्पष्ट संदेश जारी किया गया है। मुजतबा खामेनेई ने सरकारी टेलीविजन पर प्रसारित अपने लिखित बयान में यह साफ कर दिया है कि ईरान अपनी परमाणु और मिसाइल क्षमताओं के मामले में किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे घुटने नहीं टेकेगा। उन्होंने इन सैन्य और वैज्ञानिक शक्तियों को देश की “राष्ट्रीय पूंजी” करार देते हुए कहा कि इनकी रक्षा करना ईरान की संप्रभुता के लिए उतना ही आवश्यक है जितना कि अपनी सीमाओं की सुरक्षा करना।
इस बयान में मुजतबा खामेनेई ने अमेरिका की सैन्य उपस्थिति पर तीखा प्रहार किया है। उन्होंने दावा किया कि मध्य पूर्व में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकाने (बेस) इतने कमजोर और खोखले हो चुके हैं कि वे खुद की रक्षा करने में भी सक्षम नहीं हैं। मुजतबा ने सवाल उठाया कि जो देश अपने ठिकानों को सुरक्षित नहीं रख सकता, वह इस क्षेत्र के अन्य देशों को सुरक्षा की गारंटी देने का झूठा दावा कैसे कर सकता है। यह बयान सीधे तौर पर उन खाड़ी देशों को संबोधित था जो सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर हैं।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर भी ईरान ने अपना रुख स्पष्ट किया है। खामेनेई ने इसे ईरान की सबसे बड़ी सामरिक ताकत और “ईश्वर का आशीर्वाद” बताया। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र न केवल ईरान की पहचान का हिस्सा है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की एक महत्वपूर्ण धमनी भी है। उनके अनुसार, हॉर्मुज में अब एक नए युग की शुरुआत हो चुकी है, जो आने वाले समय में बाहरी दखलअंदाजी को खत्म कर क्षेत्र में आर्थिक तरक्की और वास्तविक शांति लेकर आएगा।
ईरान ने पश्चिमी शक्तियों, विशेषकर अमेरिका और यूरोपीय देशों पर ऐतिहासिक रूप से इस क्षेत्र में अस्थिरता पैदा करने का आरोप लगाया है। मुजतबा ने अपने संदेश में कहा कि सदियों से ‘शैतानी ताकतों’ की नजर ईरान के संसाधनों पर रही है। उन्होंने ‘ग्रेट सैटन’ (अमेरिका) के हालिया कदमों को ‘तलवार लहराना’ करार दिया और कहा कि ईरान अब इन धमकियों से डरने वाला नहीं है। उन्होंने साफ किया कि ईरान की जनता अपनी आधुनिक तकनीकों और रक्षा प्रणालियों की रक्षा के लिए जान की बाजी लगाने को तैयार है।
बयान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ईरान की वैज्ञानिक प्रगति पर केंद्रित था। मुजतबा ने नैनो-टेक्नोलॉजी, बायो-टेक्नोलॉजी से लेकर न्यूक्लियर और मिसाइल प्रोग्राम तक को ईरानी राष्ट्र की बौद्धिक और औद्योगिक उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा कि 90 मिलियन ईरानी नागरिक अपनी इस आध्यात्मिक और वैज्ञानिक विरासत को बचाने के लिए एकजुट हैं। यह संदेश केवल घरेलू जनता के लिए नहीं, बल्कि पूरी ‘इस्लामिक उम्माह’ (मुस्लिम जगत) को एकजुट करने की एक कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
ईरान ने इस दौरान इजरायल (जियोनिज्म) के खिलाफ भी अपना पुराना कड़ा रुख बरकरार रखा। मुजतबा ने अमेरिका और इजरायल को “खून का प्यासा” बताते हुए कहा कि ईरानी राष्ट्र उनके खिलाफ संघर्ष में पीछे नहीं हटेगा। उन्होंने शहादत की संस्कृति का जिक्र करते हुए कहा कि हजारों लोगों के बलिदान के बाद ईरान आज इस मुकाम पर पहुँचा है कि वह किसी भी महाशक्ति के सामने झुकने को मजबूर नहीं है।
कूटनीतिक स्तर पर, इस बयान में एक दिलचस्प बदलाव भी देखने को मिला। मुजतबा खामेनेई ने अपने पड़ोसी सुन्नी देशों की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया है। उन्होंने कहा कि ईरान अपने पड़ोसियों के साथ एक जैसी किस्मत साझा करता है और वह क्षेत्र के देशों के साथ बेहतर संबंध चाहता है। यह संदेश संभवतः सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के लिए था, जिसमें ईरान यह जताना चाहता है कि उसका असली संघर्ष पश्चिमी शक्तियों से है, न कि अपने पड़ोसियों से।
बयान के अंत में एक “अमेरिका-मुक्त भविष्य” की परिकल्पना की गई है। मुजतबा ने विश्वास जताया कि फारस की खाड़ी का उज्ज्वल भविष्य केवल तभी संभव है जब अमेरिका इस क्षेत्र से पूरी तरह बाहर हो जाए। उन्होंने तर्क दिया कि क्षेत्रीय सुरक्षा बाहरी ताकतों के उधार के ठिकानों से नहीं, बल्कि आपसी सहयोग और भरोसे से आएगी। ईरान का यह विजन क्षेत्र में एक नए सुरक्षा ढांचे की मांग करता है जिसमें ईरान की भूमिका सबसे प्रमुख हो।
विशेषज्ञों का मानना है कि मुजतबा खामेनेई का यह बयान ईरान की विदेश नीति में बढ़ते कट्टरपन और आत्मविश्वास को दर्शाता है। जहाँ एक तरफ ईरान अपनी सैन्य ताकत को कम न करने पर अड़ा है, वहीं दूसरी तरफ वह क्षेत्रीय गुटबाजी को खत्म कर अमेरिका को अलग-थलग करने की कोशिश में है। यह लिखित बयान ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर परमाणु ऊर्जा और हथियारों की होड़ को लेकर पहले से ही तनाव की स्थिति बनी हुई है।
फिलहाल, विश्व समुदाय की नजरें अब अमेरिका और खाड़ी देशों की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं। क्या ईरान का यह परमाणु और मिसाइल अडिगता का दावा नए प्रतिबंधों को न्योता देगा, या फिर यह क्षेत्र में एक नई शक्ति संतुलन की शुरुआत है? आने वाले हफ्तों में हॉर्मुज और फारस की खाड़ी की लहरें इस राजनीतिक उबाल की दिशा तय करेंगी।

