रायपुर, 27 अप्रैल 2026 | छत्तीसगढ़ के कृषि परिदृश्य में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। राज्य शासन की प्रोत्साहन नीतियों और उद्यानिकी विभाग के मार्गदर्शन में अब किसान धान-गेहूं जैसे पारंपरिक चक्र से बाहर निकलकर फूलों की खेती (Floriculture) को अपना रहे हैं। वर्तमान में गेंदा, गुलाब और गुलदाउदी जैसे फूलों की खेती न केवल कम लागत में तैयार हो रही है, बल्कि यह पारंपरिक फसलों की तुलना में 3 से 4 गुना अधिक मुनाफा भी दे रही है।
रायगढ़ जिले के लैलूंगा विकासखंड के अंतर्गत आने वाले ग्राम गमेकेरा के किसान श्री ईश्वरचरण पैकरा आज इस बदलाव के जीवंत उदाहरण बन गए हैं। एक समय था जब श्री पैकरा अपनी पैतृक भूमि पर केवल धान की खेती किया करते थे। साल भर की कड़ी मेहनत के बाद भी उन्हें सीमित आय प्राप्त होती थी, जिससे परिवार की आर्थिक उन्नति की गति धीमी थी। धान की खेती में मौसम की अनिश्चितता और सीमित बाजार मूल्य हमेशा एक चिंता का विषय बने रहते थे।
किसान की किस्मत तब बदली जब उन्होंने वर्ष 2025-26 में राष्ट्रीय बागवानी मिशन से जुड़ने का फैसला किया। उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों से संपर्क करने पर उन्हें फूलों की खेती की संभावनाओं के बारे में पता चला। विभाग ने न केवल उन्हें तकनीकी सहयोग प्रदान किया, बल्कि वैज्ञानिक पद्धति से खेती करने के लिए आवश्यक प्रशिक्षण और मार्गदर्शन भी दिया। इसी प्रोत्साहन के साथ श्री पैकरा ने अपनी 0.400 हेक्टेयर भूमि पर गेंदा फूल की खेती शुरू की।
वैज्ञानिक तरीके से की गई मेहनत का परिणाम उम्मीद से कहीं बेहतर रहा। जहाँ पहले इसी भूमि पर धान लगाने से उन्हें लगभग 11 क्विंटल की उपज मिलती थी, वहीं गेंदा फूल की फसल से उन्हें रिकॉर्ड 38 क्विंटल उत्पादन प्राप्त हुआ। फूलों की इस बंपर पैदावार ने उत्पादन के पुराने सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए, जिससे किसान के चेहरे पर मुस्कान लौट आई।
बाजार में फूलों की मांग और श्री पैकरा की मेहनत ने उन्हें बड़ी आर्थिक सफलता दिलाई। इस सीजन में उन्होंने कुल 3 लाख 4 हजार रुपये की आमदनी प्राप्त की। खेती में बीज, खाद और श्रम की कुल लागत निकालने के बाद उन्हें 2 लाख 59 हजार रुपये का शुद्ध लाभ हुआ। धान की तुलना में यह लाभ कई गुना अधिक है, जो यह सिद्ध करता है कि छोटी जोत वाले किसान भी फूलों की खेती से आत्मनिर्भर बन सकते हैं।
फूलों की मांग साल भर बने रहना इस व्यवसाय की सबसे बड़ी ताकत है। शादी-ब्याह के सीजन, धार्मिक त्यौहारों और विभिन्न सामाजिक आयोजनों में गेंदा फूलों की खपत बहुत अधिक रहती है। श्री पैकरा बताते हैं कि फूलों की खेती में सबसे अच्छी बात यह है कि इसमें आय का प्रवाह निरंतर बना रहता है और कम समय में ही निवेश वापस मिल जाता है।
श्री पैकरा की इस सफलता ने पूरे गमेकेरा गांव में प्रेरणा का संचार किया है। उनके खेतों में खिले नारंगी और पीले गेंदे के फूलों की कतारें न केवल देखने में सुंदर लगती हैं, बल्कि वे क्षेत्र के अन्य किसानों को भी उद्यानिकी अपनाने का संदेश दे रही हैं। अब गांव के कई अन्य युवा और अनुभवी किसान भी उद्यानिकी विभाग से संपर्क कर रहे हैं ताकि वे भी फूलों की खेती की बारीकियां सीख सकें।
राज्य शासन की योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन से कृषि के स्वरूप में यह सकारात्मक बदलाव स्पष्ट दिखाई दे रहा है। श्री पैकरा का कहना है कि वे अब अपनी इस खेती को और भी बड़े क्षेत्र में विस्तार देने की योजना बना रहे हैं। उनकी यह कहानी साबित करती है कि यदि सही मार्गदर्शन और नई तकनीक का मेल हो, तो छत्तीसगढ़ का किसान न केवल अपनी किस्मत बदल सकता है, बल्कि राज्य की आर्थिक तरक्की में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।

