भारतीय नौसेना द्वारा आयोजित होने वाले प्रमुख अंतरराष्ट्रीय वार्षिक सम्मेलन ‘हिंद-प्रशांत क्षेत्रीय संवाद’ (IPRD-2026) का मंच सज चुका है। नई दिल्ली में आयोजित होने वाला यह तीन दिवसीय उच्चस्तरीय संवाद 3 से 5 नवंबर 2026 तक चलेगा, जिसमें समुद्री सुरक्षा, अत्याधुनिक तकनीक और आपसी सहयोग के कई अहम मुद्दों पर गहन मंथन किया जाएगा।
इस वर्ष के संवाद का मुख्य विषय “हिंद-प्रशांत क्षेत्र में विज्ञान, तकनीक और शैक्षणिक सहयोग” निर्धारित किया गया है। इसका उद्देश्य केवल पारंपरिक रणनीतिक चर्चाओं तक सीमित रहना नहीं है, बल्कि क्षेत्र के विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और तकनीकी विशेषज्ञों को एक साझा मंच पर लाकर समुद्री चुनौतियों का व्यावहारिक और वैज्ञानिक समाधान खोजना है।
सम्मेलन के दौरान समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने के लिए उभरती हुई तकनीकों के इस्तेमाल पर विशेष जोर दिया जाएगा। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, महासागर अवलोकन प्रणालियों, जलवायु लचीलापन, और नागरिक एवं सैन्य दोनों क्षेत्रों में काम आने वाली ‘दोहरे उपयोग’ वाली तकनीकों पर तकनीकी सत्र आयोजित होंगे।
इस प्रतिष्ठित आयोजन में हिंद-प्रशांत क्षेत्र के कुल 18 देशों के प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं। इसमें विभिन्न देशों के नौसेना अधिकारी, समुद्री वैज्ञानिक, प्रतिष्ठित शिक्षाविद, नीति निर्माता और राजनयिक शामिल हैं, जो अपने-अपने देशों के अनुभव साझा करते हुए एक सुरक्षित और समृद्ध क्षेत्र की रूपरेखा तैयार करेंगे।
संवाद के उद्घाटन सत्र में देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे और सभा को संबोधित करेंगे। इसके अतिरिक्त, इस कार्यक्रम में भारत और श्रीलंका के पूर्व नौसेना प्रमुखों द्वारा ‘पर्सपेक्टिव्स फ्रॉम द फ्लैग ब्रिज’ नामक विशेष सत्र का संचालन किया जाएगा, जिसमें वे अपने दीर्घकालिक रणनीतिक अनुभवों को साझा करेंगे।
भारतीय नौसेना इस अंतरराष्ट्रीय संवाद का आयोजन अपने प्रमुख ज्ञान सहयोगी ‘नेशनल मैरीटाइम फाउंडेशन’ (National Maritime Foundation) के साथ मिलकर कर रही है। यह संस्था समुद्री मामलों से जुड़े अकादमिक अनुसंधान और रणनीतिक नीतियों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
कुल मिलाकर, IPRD-2026 केवल एक कूटनीतिक बैठक नहीं है, बल्कि यह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में विज्ञान और शिक्षा के माध्यम से भरोसे की एक मजबूत नींव रखने का प्रयास है। यह मंच भविष्य की समुद्री चुनौतियों से निपटने के लिए क्षेत्रीय देशों के बीच वैज्ञानिक साझीदारी और अकादमिक आदान-प्रदान को एक ठोस और स्थायी दिशा देगा।

