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    Home»हेल्थ»अस्पताल खुद ग्रामीण के द्वार: छत्तीसगढ़ के वनांचलों में वरदान साबित हो रही मोबाइल मेडिकल यूनिट
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    अस्पताल खुद ग्रामीण के द्वार: छत्तीसगढ़ के वनांचलों में वरदान साबित हो रही मोबाइल मेडिकल यूनिट

    Brijesh ChoudharyBy Brijesh ChoudharyApril 30, 2026181 Views
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    रायपुर, 30 अप्रैल 2026 – छत्तीसगढ़ के दुर्गम वनांचलों और दुर्गम पहाड़ियों पर निवास करने वाली विशेष पिछड़ी जनजातियों के लिए राज्य शासन की ‘मोबाइल मेडिकल यूनिट’ (MMU) एक जीवन रक्षक वरदान साबित हो रही है। ‘अस्पताल खुद ग्रामीण के द्वार’ की संकल्पना को धरातल पर उतारते हुए, इस सेवा ने पिछले मात्र साढ़े तीन महीनों के भीतर 2,035 लोगों को उनके घरों के निकट ही उच्च स्तरीय चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई है। यह पहल उन क्षेत्रों में उम्मीद की नई किरण लेकर आई है, जहाँ बुनियादी सुविधाओं का पहुँचना कभी एक बड़ी चुनौती माना जाता था।

    पूर्व में, इन क्षेत्रों के ग्रामीणों को सामान्य बुखार या छोटी-मोटी चोट के इलाज के लिए भी कई मील का सफर पैदल तय करना पड़ता था। परिवहन साधनों के अभाव और कठिन रास्तों के कारण कई बार लोग अस्पताल जाने से कतराते थे, जिससे बीमारियाँ गंभीर रूप ले लेती थीं। प्रधानमंत्री जनमन योजना के अंतर्गत 15 जनवरी 2026 से संचालित यह यूनिट अब विशेष पिछड़ी जनजाति ‘कमार’ बाहुल्य ग्राम बल्दाकछार, औराई और कसडोल क्षेत्र के अन्य सुदूर गांवों में निरंतर स्वास्थ्य कैंप आयोजित कर रही है।

    इस ‘चलते-फिरते अस्पताल’ की सबसे बड़ी खासियत इसकी व्यापकता है। प्रत्येक मोबाइल यूनिट में केवल दवाइयाँ ही नहीं, बल्कि दक्ष चिकित्सा कर्मियों की पूरी टीम मौजूद रहती है। इसमें एक अनुभवी मेडिकल ऑफिसर, लैब टेक्निशियन, नर्स और ड्राइवर शामिल होते हैं। यह टीम सुनिश्चित करती है कि ग्रामीणों को शहर के किसी बड़े अस्पताल जैसा ही परामर्श और देखभाल उनके अपने मोहल्ले में ही प्राप्त हो सके।

    जांच सुविधाओं के मामले में भी यह यूनिट किसी क्लिनिक से कम नहीं है। मौके पर ही बीपी, शुगर, मलेरिया और हीमोग्लोबिन जैसी महत्वपूर्ण जांचें निःशुल्क की जा रही हैं। इसके साथ ही, डॉक्टरों द्वारा गहन चिकित्सा सलाह दी जाती है और आवश्यक दवाइयों का वितरण भी बिना किसी शुल्क के किया जा रहा है। जांच और दवा की यह ‘एक छत के नीचे’ उपलब्धता ग्रामीणों के लिए अत्यंत सुविधाजनक साबित हुई है।

    प्रशासन ने इस सेवा को व्यवस्थित बनाने के लिए एक प्रभावी कार्ययोजना तैयार की है। कैंप कहाँ और कब लगेगा, इसका निर्धारण एक माह पूर्व ही कर लिया जाता है। सूचना के अभाव में कोई ग्रामीण छूट न जाए, इसके लिए गांव-गांव में पारंपरिक तरीके से ‘मुनादी’ (ढोल बजाकर घोषणा) करवाई जाती है। इस पूर्व-नियोजित व्यवस्था के कारण ग्रामीणों में भारी उत्साह देखा जा रहा है और वे निर्धारित समय पर कैंप पहुँचकर अपना स्वास्थ्य परीक्षण करवा रहे हैं।

    स्थानीय ग्रामीणों के फीडबैक से पता चलता है कि इस सेवा ने उनके जीवन की गुणवत्ता में बड़ा सुधार किया है। ग्रामीणों का कहना है कि पहले अस्पतालों की लंबी कतारों और आने-जाने की समस्याओं के कारण उनका पूरा दिन बर्बाद हो जाता था और आर्थिक बोझ भी पड़ता था। अब घर के पास ही विशेषज्ञ डॉक्टरों के मिलने से समय और धन दोनों की बचत हो रही है, जिससे वे अपने दैनिक कार्यों और खेती-किसानी पर अधिक ध्यान दे पा रहे हैं।

    इस पहल का एक दूरगामी प्रभाव जनजातीय समाज की सोच में आए बदलाव के रूप में दिख रहा है। सदियों से ये समुदाय केवल पारंपरिक जड़ी-बूटियों या बैगा-गुनिया (झाड़-फूंक) पर ही निर्भर थे। लेकिन अब, घर के पास मिलने वाले सफल इलाज ने उनमें आधुनिक चिकित्सा पद्धति के प्रति गहरा विश्वास पैदा किया है। लोग अब बीमारियों को दैवीय प्रकोप मानकर छिपाने के बजाय, समय पर वैज्ञानिक जांच और इलाज को प्राथमिकता देने लगे हैं।

    निष्कर्षतः, मोबाइल मेडिकल यूनिट की यह सफलता दर्शाती है कि यदि स्वास्थ्य सेवाएं समावेशी और सुलभ हों, तो वह समाज के अंतिम व्यक्ति तक सकारात्मक परिवर्तन ला सकती हैं। छत्तीसगढ़ के वनांचलों में गूँजती इन एम्बुलेंसों की आवाज़ अब केवल एक सायरन नहीं, बल्कि स्वस्थ भविष्य की गूँज बन गई है। यह योजना न केवल उपचार कर रही है, बल्कि परंपरा और आधुनिकता के बीच एक मजबूत सेतु का निर्माण भी कर रही है।

    Brijesh Choudhary
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