भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में आज का दिन बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि 7 अप्रैल, 2026 को सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ आधी आबादी के अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच के द्वंद्व को सुलझाने के लिए अंतिम सुनवाई शुरू कर रही है। देश की सर्वोच्च अदालत आज से उन याचिकाओं पर गौर करेगी जो पिछले 26 वर्षों से अलग-अलग स्तरों पर लंबित थीं। मुख्य रूप से यह सुनवाई केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश, मस्जिदों में नमाज पढ़ने की अनुमति और पारसी महिलाओं के अधिकारों जैसे संवेदनशील विषयों पर केंद्रित है।
सबरीमाला विवाद इस पूरी सुनवाई की धुरी है, जहां कोर्ट यह तय करेगा कि क्या 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक को हटाने का 2018 का निर्णय बरकरार रहना चाहिए। मंदिर के पुजारियों और कई हिंदू संगठनों का तर्क है कि देवता की प्रकृति और मंदिर की परंपराओं में अदालती हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए, जबकि अधिकारों के पैरोकार इसे लैंगिक समानता का मुद्दा मानते हैं। आज से शुरू होकर 9 अप्रैल तक याचिकाकर्ता अपनी दलीलें रखेंगे, जिसके बाद विरोधियों को अपना पक्ष रखने का मौका मिलेगा।
इस संवैधानिक पीठ के सामने दूसरा गंभीर मुद्दा दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रचलित ‘महिला खतना’ (FGM) की प्रथा है। सुप्रीम कोर्ट इस बात की गहराई से जांच करेगा कि क्या यह प्रथा धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे में आती है या यह महिलाओं के स्वास्थ्य, गरिमा और उनके मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 21) का गंभीर उल्लंघन है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि यह प्रथा बच्चियों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गहरा आघात करती है, जिसे धर्म के नाम पर जायज नहीं ठहराया जा सकता।
वहीं, मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश और नमाज पढ़ने के अधिकार पर भी कोर्ट एक स्पष्ट लकीर खींचने की तैयारी में है। यास्मीन जुबैर अहमद पीरजादा की याचिका यह सवाल उठाती है कि जब पुरुष मस्जिद में जा सकते हैं, तो महिलाओं को अलग क्यों रखा जाता है। कोर्ट यह विश्लेषण करेगा कि क्या इस्लाम में महिलाओं का मस्जिद में प्रवेश वर्जित है या यह केवल एक पितृसत्तात्मक सामाजिक परंपरा है जो समानता के अधिकार को चुनौती देती है।
इसी कड़ी में पारसी महिलाओं के धार्मिक अधिकारों का मामला भी शामिल है। यह मुद्दा विशेष रूप से उन महिलाओं से जुड़ा है जिन्होंने गैर-पारसी पुरुषों से विवाह किया है और इसके आधार पर उन्हें ‘टावर ऑफ साइलेंस’ या ‘अग्नि मंदिर’ जैसे पवित्र स्थानों में प्रवेश से वंचित कर दिया जाता है। गूलरुख एम. गुप्ता जैसे याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि विवाह के आधार पर किसी महिला की धार्मिक पहचान और उसके प्रार्थना के अधिकार को छीना नहीं जा सकता, जो कि भेदभावपूर्ण है।
कोविड-19 महामारी के कारण चार साल तक रुकी रही यह सुनवाई अब अपने निर्णायक चरण में है। 22 अप्रैल तक चलने वाली इस कानूनी प्रक्रिया में कोर्ट मुख्य रूप से ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथा’ (Essential Religious Practice) के सिद्धांत की व्याख्या करेगा। न्यायाधीशों को यह तय करना है कि संविधान की धारा 25 और 26 के तहत मिलने वाली धार्मिक स्वतंत्रता किस हद तक समानता के अधिकार (धारा 14) के अधीन है, जो आने वाले समय में देश की सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था की दिशा तय करेगा।

