दिल्ली के पर्यावरण संरक्षण के लिए सुरक्षित रखे गए करोड़ों रुपये के गबन के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए बैंक ऑफ बड़ौदा को बड़ी कार्रवाई का निर्देश दिया है। कोर्ट ने बैंक को आदेश दिया है कि वह ₹217.6 करोड़ से अधिक की राशि रजिस्ट्रार जनरल के पास जमा कराए। यह मामला उस समय सुर्खियों में आया जब दिल्ली रिज क्षेत्र के रखरखाव के लिए निर्धारित फंड में से करीब ₹70.25 करोड़ के “गायब” होने की जानकारी सामने आई।
यह पूरी विवादित राशि रिज मैनेजमेंट बोर्ड की थी, जिसे दिल्ली के हरित क्षेत्र और अरावली की पहाड़ियों (रिज) को बचाने के लिए आरक्षित किया गया था। नियमों के मुताबिक, इस धन का उपयोग केवल पर्यावरण की बेहतरी और पेड़ों के संरक्षण के लिए होना था। हालांकि, बैंक की कार्यप्रणाली और वन विभाग के समन्वय में हुई कथित चूक ने इस विशाल राशि को खतरे में डाल दिया।
मामले की पृष्ठभूमि पर गौर करें तो वन एवं वन्यजीव विभाग ने अधिक ब्याज दर (5.25%) का लाभ लेने के उद्देश्य से भारतीय स्टेट बैंक (SBI) से करीब ₹223 करोड़ की राशि बैंक ऑफ बड़ौदा की देशबंधु रोड शाखा में स्थानांतरित की थी। विभाग ने इस राशि को 113 फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) के रूप में निवेश किया था, ताकि भविष्य में संरक्षण कार्यों के लिए धन की उपलब्धता बनी रहे।
हैरानी की बात तब सामने आई जब विभाग ने आरोप लगाया कि बैंक अधिकारियों ने कथित तौर पर ‘बदनीयती’ से काम किया और लगभग ₹70.25 करोड़ की राशि अवैध तरीके से खातों से निकाल ली गई। विभाग का दावा है कि यह एक सोची-समझी साजिश के तहत किया गया वित्तीय अपराध है, जिसमें बैंक के आंतरिक सिस्टम और अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध है।
दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस जसमीत सिंह ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए बैंक ऑफ बड़ौदा की उन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया, जिनमें बैंक ने सारी जिम्मेदारी वन विभाग के अधिकारियों पर थोपने की कोशिश की थी। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बैंक अपनी निगरानी की विफलता के लिए दूसरों को दोषी नहीं ठहरा सकता, विशेषकर तब जब सार्वजनिक धन का दुरुपयोग हुआ हो।
अदालत ने सुनवाई के दौरान गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि एक तरफ दिल्ली का पर्यावरण और वायु गुणवत्ता लगातार चिंताजनक स्तर पर पहुंच रही है, वहीं दूसरी ओर संरक्षण के लिए रखे गए करोड़ों रुपये गबन का शिकार हो रहे हैं। कोर्ट ने इसे दिल्ली की जनता और प्रकृति के साथ बड़ा धोखा करार दिया और धन की तुरंत वापसी की प्रक्रिया पर जोर दिया।
वर्तमान स्थिति यह है कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) इस पूरे प्रकरण की सघन जांच कर रही है। इसे केवल एक बैंकिंग धोखाधड़ी नहीं, बल्कि बड़े स्तर पर किए गए सार्वजनिक धन के गबन के रूप में देखा जा रहा है। जांच का दायरा बैंक अधिकारियों से लेकर उन कड़ियों तक फैला है, जिन्होंने फर्जीवाड़े के जरिए पैसे की निकासी की।
बैंक ऑफ बड़ौदा के वकील कुश शर्मा ने अदालत को आश्वस्त किया है कि बैंक आगामी सुनवाई से पहले ₹2,17,60,98,379 की पूरी राशि रजिस्ट्रार जनरल के पास जमा कर देगा। यह राशि उन निर्विवाद फंडों और उस विवादित ₹70.24 करोड़ के हिस्से का योग है, जो वर्तमान में आपराधिक जांच के अधीन है। बैंक का यह कदम कोर्ट की फटकार के बाद आया है।
इस विवाद के बीच एक नया मोड़ तब आया जब दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (DUSIB) ने भी अपने फंड के साथ इसी तरह की वित्तीय अनियमितता का आरोप लगाते हुए एक अलग याचिका दायर की। मामलों के आपस में जुड़े होने के कारण, जस्टिस रजनीश कुमार गुप्ता ने DUSIB की याचिका को भी उसी पीठ के पास भेज दिया है, जो वन विभाग के मामले की सुनवाई कर रही है।
अब सबकी निगाहें 12 मई को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं। इस दिन यह स्पष्ट होगा कि बैंक ने पूरी राशि जमा की है या नहीं, और क्या सीबीआई की जांच में कुछ नए और बड़े नामों का खुलासा होता है। यह मामला भविष्य में सरकारी विभागों और बैंकों के बीच होने वाले बड़े वित्तीय लेनदेन के लिए एक कड़ा सबक साबित होगा।

