रायपुर: छत्तीसगढ़ विधानसभा में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ पर चर्चा के लिए आयोजित विशेष सत्र हंगामेदार रहा। सदन की कार्यवाही के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली। जहाँ भाजपा ने इस सत्र के माध्यम से केंद्र सरकार की महिला आरक्षण नीति का समर्थन किया, वहीं कांग्रेस ने इस सत्र के आयोजन के पीछे की मंशा और इसकी प्रासंगिकता पर गंभीर सवाल खड़े किए। पूरे दिन सदन में महिला सशक्तिकरण बनाम राजनीतिक लाभ की बहस चलती रही।
सत्र की शुरुआत में महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े ने मोदी सरकार की जमकर सराहना की। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार महिलाओं को सशक्त करने के लिए प्रतिबद्ध है और इसी कड़ी में नारी शक्ति वंदन अधिनियम लाया गया था। उन्होंने विपक्ष पर सीधा प्रहार करते हुए आरोप लगाया कि महिला विरोधी मानसिकता के कारण विपक्ष ने इस ऐतिहासिक कदम को बाधित करने का प्रयास किया है। राजवाड़े ने स्पष्ट किया कि सरकार 2029 के चुनावों में आरक्षण देने के पक्ष में है, फिर भी विपक्ष का विरोध समझ से परे है।
मंत्री राजवाड़े ने संसद में विपक्ष के आचरण पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि एक तरफ प्रधानमंत्री राष्ट्र निर्माण के अभियान में जुटे हैं, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष के नेता उनके खिलाफ अपशब्दों का प्रयोग कर उन्हें अपमानित करने का काम कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष महिला आरक्षण की राह रोककर खुशी मना रहा है और जनता उनकी इस नकारात्मक राजनीति को देख रही है। मंत्री ने जोर देकर कहा कि भाजपा सरकार में महिलाओं के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं संचालित की जा रही हैं।
दूसरी ओर, नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने सरकार के इन आरोपों का पुरजोर खंडन किया। उन्होंने इस विशेष सत्र को पूरी तरह से “गैर-जरूरी” और “औचित्यहीन” करार दिया। महंत ने तर्क दिया कि जब यह बिल संसद में पेश किया गया था और वहां की कार्यवाही का हिस्सा है, तो छत्तीसगढ़ विधानसभा में इस पर चर्चा करने का कोई संवैधानिक प्रभाव नहीं पड़ेगा। उन्होंने सत्ता पक्ष से सवाल किया कि क्या केवल कांग्रेस की निंदा करने के लिए जनता के पैसे से यह विशेष सत्र बुलाया गया है?
डॉ. महंत ने भाजपा की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि 2023 में संसद में महिला आरक्षण बिल सर्वसम्मति से पास हो गया था, तो उसे तुरंत लागू करने के बजाय नए संशोधनों और परिसीमन के नाम पर लटकाया क्यों जा रहा है? उन्होंने कहा कि कांग्रेस शुरू से ही महिला आरक्षण की पक्षधर रही है और आजादी के बाद से ही महिलाओं को नेतृत्व देने का काम किया है। उन्होंने भाजपा पर इसे ‘ईवेंट’ बनाने का आरोप लगाते हुए कहा कि गैलरी में महिलाओं को बैठाकर सम्मान करने के बजाय उन्हें वास्तविक अधिकार देने चाहिए।
भाजपा विधायक अजय चंद्राकर ने नेता प्रतिपक्ष के “गैर-जरूरी” शब्द पर कड़ी आपत्ति जताई और इसे सदन की कार्यवाही से विलोपित करने की मांग की। चंद्राकर ने कहा कि संवैधानिक प्रक्रियाओं और चर्चाओं को अनावश्यक कहना संसदीय गरिमा के खिलाफ है। उन्होंने पलटवार करते हुए कहा कि कांग्रेस ने कभी ईमानदारी से महिला आरक्षण की दिशा में काम नहीं किया, जबकि छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार ने ही स्थानीय निकायों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देकर उन्हें जमीनी स्तर पर मजबूत किया है।
सत्र का समापन सत्ता पक्ष और विपक्ष के अपने-अपने दावों के साथ हुआ। सत्ता पक्ष ने जहाँ इसे नारी शक्ति के सम्मान का संकल्प बताया, वहीं विपक्ष ने इसे राजनीतिक रूप से बदनाम करने की एक साजिश करार दिया। कुल मिलाकर, यह विशेष सत्र महिला आरक्षण के कार्यान्वयन की तकनीकी बारीकियों से ज्यादा राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई का अखाड़ा बना रहा, जिसमें दोनों ही दल खुद को महिलाओं का असली हितैषी साबित करने में जुटे रहे।

