बिलासपुर: छत्तीसगढ़ में मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्तों की हालिया नियुक्तियों को लेकर कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। राजनांदगांव निवासी प्रदीप शर्मा द्वारा अधिवक्ता अली असगर के माध्यम से दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए बिलासपुर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। न्यायमूर्ति पी. पी. साहू की एकल पीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए शासन से चार सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब तलब किया है। याचिका में दावा किया गया है कि इन महत्वपूर्ण पदों पर चयन के दौरान निर्धारित कानूनी प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों की स्पष्ट अनदेखी की गई है।
याचिका में मुख्य रूप से सुप्रीम कोर्ट द्वारा नमित शर्मा और अंजलि भारद्वाज मामलों में दिए गए ऐतिहासिक फैसलों का हवाला दिया गया है। इन फैसलों के अनुसार, सूचना आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए और इसमें समाज के विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को शामिल किया जाना चाहिए। याचिकाकर्ता का आरोप है कि छत्तीसगढ़ में इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और पूरी चयन प्रक्रिया केवल नौकरशाहों के इर्द-गिर्द सिमटी रही, जिससे पारदर्शिता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
मामले का एक सबसे विवादास्पद पहलू ‘सर्च कमेटी’ के गठन को लेकर है। याचिका में तर्क दिया गया है कि जहां तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में सर्च कमेटी की अध्यक्षता हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश करते हैं, वहीं छत्तीसगढ़ में इस कमेटी के अध्यक्ष और सभी सदस्य केवल ब्यूरोक्रेट्स (अधिकारी) थे। इसके अतिरिक्त, यह भी आरोप लगाया गया है कि मुख्य सूचना आयुक्त पद के लिए आवेदन करने वाले संबंधित अधिकारी ने पद पर रहते हुए अपने ही अधीनस्थों के सामने इंटरव्यू दिया, जो प्रशासनिक नैतिकता और निष्पक्षता के सिद्धांतों के विरुद्ध है।
याचिका में चयन प्रक्रिया की विसंगतियों पर प्रहार करते हुए यह भी बताया गया है कि वर्ष 2024 में जिन दो उम्मीदवारों को सूचना आयुक्त पद के लिए अयोग्य घोषित किया गया था, उन्हें मात्र छह महीने के भीतर अचानक योग्य मानकर चुन लिया गया। इस प्रकार के विरोधाभासी निर्णयों ने पूरी चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता को संदिग्ध बना दिया है। कोर्ट ने अब गेंद सरकार के पाले में डाल दी है, जिसका जवाब तय करेगा कि ये नियुक्तियां बरकरार रहेंगी या इनमें फिर से बदलाव की स्थिति बनेगी।

