कानपुर में उजागर हुआ किडनी तस्करी का यह मामला केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि मानवता और चिकित्सा जगत के नाम पर एक गहरा कलंक है। इस पूरे गिरोह का खुलासा तब हुआ जब बिहार के एक युवक ने पुलिस को अपनी किडनी धोखे से निकाले जाने की सूचना दी। अब तक की जांच में सामने आया है कि यह नेटवर्क बेहद संगठित तरीके से काम कर रहा था, जिसने करीब 60 से ज्यादा अवैध किडनी ट्रांसप्लांट को अंजाम दिया। यह रैकेट गरीबों की मजबूरी और अमीरों की बीमारी का फायदा उठाकर करोड़ों रुपये का काला कारोबार कर रहा था।
इस गिरोह के काम करने का तरीका बेहद शातिर था। दलाल सबसे पहले आर्थिक रूप से कमजोर और जरूरतमंद लोगों को अपना निशाना बनाते थे। उन्हें चंद रुपयों का लालच देकर किडनी देने के लिए तैयार किया जाता था। वहीं दूसरी ओर, किडनी की तलाश कर रहे अमीर मरीजों से संपर्क किया जाता और उनसे लाखों-करोड़ों रुपये वसूले जाते थे। डोनर और मरीज के बीच कोई सीधा संपर्क नहीं होने दिया जाता था, ताकि लेनदेन और अंग के बदले दी जाने वाली वास्तविक रकम का पता किसी को न चल सके।
घटना का पर्दाफाश 30 मार्च को हुआ जब आयुष नामक युवक ने हिम्मत दिखाई। आयुष ने बताया कि उससे किडनी के बदले 6 लाख रुपये का वादा किया गया था, लेकिन उसे केवल 3 लाख रुपये ही दिए गए। पुलिस की गहन पड़ताल में यह चौंकाने वाला सच सामने आया कि आयुष की किडनी का सौदा 9 लाख रुपये में हुआ था, लेकिन जिस मरीज को वह किडनी लगाई गई, उससे गिरोह ने करीब 90 लाख रुपये ऐंठे थे। मुनाफे का यह बड़ा हिस्सा दलालों और भ्रष्ट डॉक्टरों की जेब में गया।
इस मामले में सबसे डरावना तथ्य यह है कि इंसानी जिंदगी के साथ खिलवाड़ करने की सारी हदें पार कर दी गईं। किडनी निकालने और प्रत्यारोपण (Transplant) का जटिल ऑपरेशन किसी प्रशिक्षित या मान्यता प्राप्त सर्जन ने नहीं, बल्कि मुदस्सर अली नाम के एक ओटी टेक्निशियन ने किया था। बिना किसी मेडिकल डिग्री के ऑपरेशन थिएटर में जानलेवा जोखिम लेना यह दर्शाता है कि इस गिरोह के लिए इंसानी जान की कीमत सिर्फ पैसों तक ही सीमित थी। आरोपी टेक्निशियन फिलहाल पुलिस की गिरफ्त से बाहर है।
कानपुर पुलिस ने इस संगठित अपराध के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करते हुए अब तक 8 लोगों को गिरफ्तार किया है। इस फेहरिस्त में शहर के कई नामचीन अस्पतालों के डॉक्टर शामिल हैं, जो चिकित्सा जैसे पवित्र पेशे को शर्मसार कर रहे थे। गिरफ्तार किए गए लोगों में आहुजा अस्पताल के डॉ. सुरजीत आहूजा और डॉ. प्रीति आहूजा, मेड लाइफ अस्पताल के डॉ. राजेश कुमार और डॉ. राम प्रकाश, और प्रिया हॉस्पिटल के डॉ. नरेंद्र सिंह के नाम प्रमुख हैं। इन गिरफ्तारियों ने पूरे मेडिकल सिस्टम की साख पर सवालिया निशान लगा दिया है।
जांच के दौरान पुलिस को पता चला है कि इस गिरोह का नेटवर्क केवल उत्तर प्रदेश के कानपुर, मेरठ या दिल्ली तक ही सीमित नहीं था, बल्कि इसके तार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जुड़े हुए थे। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, नेपाल और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों के मरीज भी इस गिरोह के संपर्क में थे। दक्षिण अफ्रीका की एक महिला मरीज से इस गिरोह ने करीब 2 से 2.5 करोड़ रुपये वसूलने का सौदा किया था। यह नेटवर्क विदेशी मरीजों को भारत बुलाकर अवैध तरीके से अंग प्रत्यारोपण की सुविधा मुहैया करा रहा था।

यह मामला प्रशासनिक लापरवाही और अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाता है। इतने बड़े पैमाने पर बिना वैध कागजों और बिना योग्य डॉक्टरों के ट्रांसप्लांट होते रहे और स्थानीय प्रशासन को इसकी भनक तक नहीं लगी। डोनर्स के फर्जी कागजात तैयार करना और रिश्तों को गलत तरीके से पेश करना इस गिरोह के बाएं हाथ का खेल था। अस्पताल प्रबंधन और स्वास्थ्य विभाग की मिलीभगत के बिना इतने समय तक ऐसे रैकेट का चलना लगभग नामुमकिन है।
फिलहाल, पुलिस इस पूरे सिंडिकेट की गहराई तक जाने की कोशिश कर रही है। फरार आरोपियों की तलाश के लिए दबिश दी जा रही है और उन मरीजों व डोनर्स की सूची तैयार की जा रही है जो इस रैकेट का हिस्सा रहे। यह घटना समाज के लिए एक चेतावनी है कि अंगों की कमी का लाभ उठाकर कैसे आपराधिक तत्व एक समानांतर व्यवस्था चला रहे हैं। शासन को अब सख्त कानून के साथ-साथ चिकित्सा संस्थानों की निगरानी के लिए अधिक कड़े कदम उठाने की आवश्यकता है।

