मध्य-पूर्व में तनाव का ग्राफ एक बार फिर तेजी से ऊपर चढ़ गया है। हालिया खुफिया रिपोर्टों ने अमेरिका और इजरायल के उन दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनमें ईरान की सैन्य कमर तोड़ने की बात कही जा रही थी। अमेरिकी इंटेलिजेंस और CNN की रिपोर्टों के अनुसार, हफ्तों तक चले लगातार हमलों के बावजूद ईरान की लगभग 50% मिसाइल लॉन्चिंग क्षमता और हजारों घातक ड्रोन अब भी पूरी तरह सुरक्षित और सक्रिय हैं। यह आंकड़ा पश्चिमी रणनीतिकारों के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि ईरान की ‘मिसाइल सिटीज’ और भूमिगत बंकरों का जाल काफी हद तक अभेद्य बना हुआ है।
रणनीतिक रूप से सबसे बड़ा खतरा होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में मंडरा रहा है। खुफिया सूत्रों का दावा है कि ईरान के पास वन-वे अटैक ड्रोन और तटीय रक्षा क्रूज मिसाइलों का भंडार जस का तस बना हुआ है। हालांकि ईरान की मुख्य नौसेना को कुछ नुकसान जरूर हुआ है, लेकिन इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की छोटी, तेज रफ्तार नौकाएं और रिमोट से चलने वाले ‘सरफेस वेसल्स’ अब भी सक्रिय हैं। इनका इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय शिपिंग को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है, जो वैश्विक तेल आपूर्ति और समुद्री व्यापार को पूरी तरह ठप करने की ताकत रखते हैं।
एक तरफ जहां सीमा पर युद्ध की स्थिति है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी प्रशासन के भीतर मची उथल-पुथल ने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है। नवनिर्वाचित राष्ट्रपति ट्रंप ने अपनी अटॉर्नी जनरल पाम बॉन्डी को पद से हटा दिया है, जिनका कार्यकाल पहले ही न्याय विभाग की स्वतंत्रता को लेकर विवादों के घेरे में रहा था। इसके तुरंत बाद, रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के आदेश पर अमेरिकी सेना प्रमुख जनरल रैंडी जॉर्ज को भी पद छोड़ने का फरमान सुना दिया गया। युद्ध के नाजुक समय में शीर्ष सैन्य और न्यायिक पदों पर इस तरह की भारी अदला-बदली ने अमेरिकी नेतृत्व की स्थिरता पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों के बीच ‘टाइम’ मैगजीन का नया कवर भी चर्चा का केंद्र बना हुआ है। इस कवर में डोनाल्ड ट्रंप को ईरान संघर्ष से बाहर निकलने का रास्ता तलाशते हुए दिखाया गया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह कवर ट्रंप प्रशासन के भीतर चल रही रणनीतिक अनिश्चितता और युद्ध को समाप्त करने के भारी दबाव को दर्शाता है। एक ओर ट्रंप प्रशासन ईरान की क्षमताओं को कम करके आंकने की कोशिश कर रहा है, तो दूसरी ओर जमीनी हकीकत और खुफिया रिपोर्टें एक लंबी और घातक खींचतान की ओर इशारा कर रही हैं।
ईरान की इस सैन्य मजबूती ने इजरायल की सुरक्षा चिंताओं को भी बढ़ा दिया है। इजरायली खुफिया एजेंसियां इस बात का आकलन कर रही हैं कि ईरान अपनी बची हुई आधी शक्ति का इस्तेमाल किस स्तर पर जवाबी कार्रवाई के लिए कर सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, 5 हफ्तों तक चले भीषण हमलों के बाद भी ईरान का कमांड और कंट्रोल सिस्टम पूरी तरह ध्वस्त नहीं हुआ है। यह स्थिति दर्शाती है कि मध्य-पूर्व में शांति की बहाली फिलहाल दूर की कौड़ी नजर आती है और आने वाले दिनों में यह सैन्य गतिरोध और भी जटिल मोड़ ले सकता है।
कुल मिलाकर, ईरान और अमेरिका के बीच का यह संघर्ष अब केवल सैन्य शक्ति के प्रदर्शन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक स्थिरता और कूटनीतिक धैर्य की भी परीक्षा बन चुका है। ईरान ने अपनी बची हुई ताकतों के दम पर यह संदेश दिया है कि वह आसानी से झुकने वाला नहीं है, जबकि ट्रंप प्रशासन को अपनी आंतरिक चुनौतियों और सैन्य फैसलों के बीच एक कठिन संतुलन बनाना होगा। वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता बनी हुई है, जिस पर फिलहाल युद्ध के काले बादल मंडरा रहे हैं।

