ब्रिटेन की अध्यक्षता में हाल ही में होर्मुज जलडमरूमध्य के संकट को लेकर एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में भारत सहित दुनिया के 60 से अधिक देशों ने शिरकत की। बैठक का मुख्य उद्देश्य खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव को कम करना और व्यापारिक जहाजों के लिए सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित करना था। ब्रिटिश विदेश मंत्री यवेट कूपर ने इस चर्चा का नेतृत्व किया, जिसमें वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई।
भारत की ओर से विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने इस चर्चा में भाग लिया और भारत का पक्ष बड़ी मजबूती से रखा। भारत ने स्पष्ट किया कि वह इस संकट से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले देशों में से एक है। मिस्री ने दुखद तथ्य रेखांकित किया कि भारत एकमात्र ऐसा देश है जिसने हाल के महीनों में इन समुद्री हमलों के कारण अपने नाविकों को खोया है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मांग की कि समुद्री कर्मियों की सुरक्षा और उनके अधिकारों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
भारत ने बैठक में अपनी ऊर्जा सुरक्षा का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया। चूंकि भारत अपनी कच्चा तेल और एलएनजी (LNG) जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है, इसलिए होर्मुज के रास्ते में कोई भी बाधा भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सीधा खतरा है। भारत ने जोर देकर कहा कि अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में ‘नेविगेशन की स्वतंत्रता’ का सम्मान हर हाल में होना चाहिए ताकि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बाधित न हो।
इस बैठक की एक खास बात अमेरिका की अनुपस्थिति रही। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य को खुला रखने की जिम्मेदारी उन देशों की होनी चाहिए जो ऊर्जा के लिए इस मार्ग पर निर्भर हैं। अमेरिका का मानना है कि उसे अब इस क्षेत्र में विश्व के ‘पुलिसकर्मी’ की भूमिका निभाने की आवश्यकता नहीं है। इस रुख ने अन्य देशों को इस संकट के समाधान के लिए खुद आगे आने पर मजबूर कर दिया है।
बैठक के समापन पर अधिकांश देशों ने इस बात पर सहमति जताई कि संकट का समाधान सैन्य बल के बजाय कूटनीतिक और राजनीतिक माध्यमों से निकाला जाना चाहिए। हालांकि, भारत ने ब्रिटेन और 35 अन्य देशों द्वारा जारी उस कड़े संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर नहीं किए, जिसमें ईरान के खिलाफ सख्त लहजे का इस्तेमाल किया गया था। भारत ने अपना स्वतंत्र रुख बरकरार रखा है, जिसका उद्देश्य ईरान के साथ सीधे संवाद के जरिए शांति स्थापित करना है।
कुल मिलाकर, यह बैठक दर्शाती है कि होर्मुज का मुद्दा अब केवल क्षेत्रीय समस्या नहीं, बल्कि एक वैश्विक चुनौती बन चुका है। भारत जैसे देशों के लिए यह एक कठिन कूटनीतिक संतुलन बनाने की स्थिति है, जहाँ उसे अपनी ऊर्जा सुरक्षा और नागरिकों की रक्षा के साथ-साथ ईरान जैसे देशों के साथ अपने पुराने संबंधों को भी बनाए रखना है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वैश्विक दबाव ईरान को इस महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग को पूरी तरह खोलने के लिए प्रेरित कर पाता है या नहीं।

