छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत मानवीय और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि नक्सली हमलों में गंभीर रूप से घायल हुए जवानों को, उनकी शारीरिक अक्षमता के बावजूद दोबारा घोर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में तैनात करना गलत है। न्यायालय ने आरक्षक दिनेश ओगरे की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। ओगरे 2016 में बीजापुर में तैनाती के दौरान सिर में गोली लगने से गंभीर रूप से घायल हो गए थे, जिसके बाद वे शारीरिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ नहीं हो पाए थे। इसके बावजूद, पुलिस विभाग ने उन्हें दोबारा बीजापुर के अति-संवेदनशील ‘अदवाड़ा कैंप’ में पदस्थ कर दिया था।
न्यायालय में आरक्षक की ओर से तर्क दिया गया कि विभाग का यह कदम डीजीपी द्वारा जारी उन सर्कुलरों का खुला उल्लंघन है, जिनमें घायल जवानों को उनकी शारीरिक क्षमता के अनुसार ‘सॉफ्ट पोस्टिंग’ या मैदानी जिलों में ड्यूटी देने के निर्देश दिए गए हैं। अधिवक्ता अभिषेक पाण्डेय ने कोर्ट को बताया कि घायल होने के कारण जवान फील्ड ड्यूटी और चुनौतीपूर्ण भौगोलिक परिस्थितियों में काम करने में सक्षम नहीं है, ऐसे में उन्हें संवेदनशील कैंप में भेजना उनकी जान जोखिम में डालना और नियमों की अनदेखी करना है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कड़ा रुख अपनाया और जवानों के स्वास्थ्य व सुरक्षा को सर्वोपरि माना। न्यायालय ने अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (ADGP) को कड़े निर्देश दिए हैं कि वे आरक्षक दिनेश ओगरे की मैदानी जिले में पदस्थापना के आवेदन पर तत्काल और सकारात्मक निर्णय लें। यह फैसला भविष्य में उन सभी जवानों के लिए एक बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है जो अपनी कर्तव्य की वेदी पर घायल होकर विभाग से संवेदनशीलता की उम्मीद रखते हैं।

