नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में अनुसूचित जाति (SC) समुदाय के खिलाफ हिंसा और जातिसूचक टिप्पणियों के आरोपियों को दी गई अग्रिम जमानत को रद्द कर दिया है। जस्टिस पी.वी. संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के उस फैसले को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें आरोपियों को राहत दी गई थी। शीर्ष अदालत ने आरोपियों की दलीलों को दरकिनार करते हुए उन्हें स्पष्ट निर्देश दिया है कि वे 15 दिनों के भीतर संबंधित अदालत या पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण (Surrender) करें।
यह पूरा विवाद दो पक्षों के बीच नाली के पानी की निकासी को लेकर शुरू हुआ था। आरोप है कि विवाद के दौरान एक पक्ष ने दलित समुदाय के लोगों के खिलाफ न केवल अपमानजनक जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया, बल्कि उन पर फायरिंग भी की। इस घटना के दौरान वहां एक पुलिस अधिकारी मौजूद था, जिसकी गवाही और मौके पर मौजूद साक्ष्यों के आधार पर पुलिस ने SC/ST एक्ट 1989, भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 और आर्म्स एक्ट 1959 के तहत मामला दर्ज किया था।
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी की। हाईकोर्ट ने इस आधार पर आरोपियों को जमानत दी थी कि FIR पीड़ित की सीधी शिकायत के बजाय एक पुलिस अधिकारी के बयान पर आधारित थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को “अनावश्यक महत्व” करार देते हुए कहा कि केवल इस तकनीकी आधार पर FIR की सत्यता या वैधता पर संदेह नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई अपराध पुलिस की मौजूदगी में होता है या पुलिस अधिकारी चश्मदीद है, तो उसकी रिपोर्ट कानूनी रूप से उतनी ही मान्य है जितनी कि पीड़ित की।
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि SC/ST अधिनियम का मुख्य उद्देश्य हाशिए पर रहने वाले समुदायों को सुरक्षा प्रदान करना और उनके खिलाफ होने वाले अत्याचारों को रोकना है। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने मामले के मूल तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों (जैसे फायरिंग और गालियों के आरोप) पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। अग्रिम जमानत देते समय अपराध की गंभीरता और अधिनियम की विशेष धाराओं के प्रतिबंधों को नजरअंदाज करना कानून की मंशा के खिलाफ है।
इस फैसले ने एक बार फिर यह स्थापित कर दिया है कि विशेष कानूनों के तहत दर्ज मामलों में प्रक्रियात्मक तकनीकी खामियों (Procedural Loopholes) को अपराध की गंभीरता पर हावी नहीं होने दिया जाएगा। यह निर्णय उन मामलों के लिए एक नजीर बनेगा जहाँ आरोपी FIR दर्ज करने की प्रक्रिया या शिकायतकर्ता की पहचान के आधार पर कानूनी राहत पाने की कोशिश करते हैं।

