नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कोविड-19 टीकाकरण के बाद गंभीर दुष्प्रभावों (AEFI) का सामना करने वाले नागरिकों के हित में एक दूरगामी और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने 10 मार्च 2026 को केंद्र सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वह एक व्यापक “नो-फॉल्ट मुआवजा नीति” (No-Fault Compensation Policy) तैयार करे। यह फैसला उन परिवारों के लिए न्याय की एक नई किरण लेकर आया है जिन्होंने वैक्सीन के प्रतिकूल प्रभावों के कारण अपने प्रियजनों को खो दिया या खुद गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं।
अदालत ने अपने फैसले में भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कहा कि ‘जीवन का अधिकार’ केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें स्वास्थ्य की सुरक्षा और राज्य की जिम्मेदारी भी शामिल है। कोर्ट ने रेखांकित किया कि जब सरकार सार्वजनिक स्वास्थ्य के हित में नागरिकों को टीकाकरण के लिए प्रोत्साहित करती है, तो उस प्रक्रिया में होने वाले किसी भी अप्रत्याशित नुकसान की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी भी सरकार की ही बनती है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि भले ही टीकाकरण अभियान व्यापक जनहित में था, लेकिन उन चंद लोगों को उनके हाल पर नहीं छोड़ा जा सकता जो इस प्रक्रिया में “दुर्भाग्यपूर्ण शिकार” बने।
“नो-फॉल्ट” सिद्धांत का अर्थ समझाते हुए अदालत ने कहा कि इस नीति के तहत पीड़ित परिवारों को मुआवजा पाने के लिए यह साबित करने की आवश्यकता नहीं होगी कि वैक्सीन निर्माता कंपनी या सरकार की ओर से कोई लापरवाही या गलती हुई थी। यदि चिकित्सकीय रूप से यह स्थापित हो जाता है कि मृत्यु या गंभीर बीमारी का सीधा संबंध वैक्सीन से था, तो सरकार को बिना किसी कानूनी जटिलता के निर्धारित मुआवजा प्रदान करना होगा। यह कदम पीड़ितों को लंबी और खर्चीली अदालती लड़ाइयों से बचाने के लिए उठाया गया है।
यह पूरा मामला रचना गंगू बनाम भारत संघ और अन्य समान याचिकाओं पर आधारित था। याचिकाकर्ताओं ने अपनी बेटियों और परिवार के सदस्यों की मृत्यु का मुद्दा उठाया था, जिनकी मौत वैक्सीन लगने के कुछ समय बाद ‘थ्रोम्बोसिस विद थ्रोम्बोसाइटोपेनिया सिंड्रोम’ (TTS) जैसे गंभीर विकारों से हुई थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि सरकार ने वैक्सीन के जोखिमों के बारे में पर्याप्त पारदर्शिता नहीं बरती और नुकसान की स्थिति में सहायता का कोई ठोस तंत्र विकसित नहीं किया।
सुप्रीम कोर्ट ने वैश्विक उदाहरणों का भी संज्ञान लिया और बताया कि अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे दुनिया के लगभग 25 विकसित देशों में पहले से ही ऐसी ‘नो-फॉल्ट’ प्रणालियाँ सक्रिय हैं। अदालत ने केंद्र सरकार को इस नीति का मसौदा तैयार करने और दावों के निपटान के लिए एक स्वतंत्र चिकित्सा बोर्ड या विशेषज्ञ ट्रिब्यूनल के गठन पर विचार करने को कहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से न केवल वर्तमान पीड़ितों को राहत मिलेगी, बल्कि भविष्य के किसी भी स्वास्थ्य अभियान के प्रति जनता का विश्वास भी मजबूत होगा।

