सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में बच्चों के अधिकारों की रक्षा और यौन अपराधों से जुड़े पोक्सो एक्ट (POCSO Act) के मामलों में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने अपने स्पष्ट निर्देश में कहा है कि किसी भी आपराधिक या पोक्सो मामले में केवल पुलिस और अभियोजन पक्ष (Prosecution) द्वारा पेश की गई कहानी को आंख मूंदकर सत्य मान लेना न्याय के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ है।
न्यायालय ने सुनवाई के दौरान इस बात पर जोर दिया कि कानून कितना भी कड़ा क्यों न हो और अपराध कितना भी गंभीर क्यों न हो, एक निर्दोष व्यक्ति को केवल इसलिए सजा नहीं दी जा सकती क्योंकि अभियोजन पक्ष ने बिना किसी चुनौती के एकतरफा कहानी गढ़ी है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अदालतों की मुख्य जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि असली अपराधी कभी न छूटे, लेकिन साथ ही किसी भी बेकसूर नागरिक को कमजोर या सतही साक्ष्यों के आधार पर कानूनी शिकंजे में न फंसाया जाए।
पिछले कुछ वर्षों में देश भर की अदालतों में पोक्सो एक्ट के तहत दर्ज मामलों में तेजी आई है, जिनमें कई बार आपसी रंजिश, पारिवारिक विवाद या जमीन-जायदाद के झगड़ों के कारण झूठे आरोप लगाए जाने की बातें भी सामने आती रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इसी कानूनी विसंगति पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा है कि अभियोजन पक्ष के हर एक बयान और आरोप की सत्यता को परखना न्यायपालिका का परम कर्तव्य है।
यदि किसी मामले में गवाहों के बयानों में विरोधाभास पाया जाता है या मेडिकल रिपोर्ट और भौतिक साक्ष्य आरोपों का समर्थन नहीं करते हैं, तो केवल पुलिस चार्जशीट के आधार पर आरोपी को दोषी करार देना न्याय के मूल उद्देश्य को आहत करता है। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद देश भर के वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं में यह उम्मीद जगी है कि अदालतों में दुर्भावना से प्रेरित या कमजोर मामलों की सुनवाई के दौरान और अधिक पारदर्शिता और निष्पक्षता देखने को मिलेगी।
पोक्सो कानून का मुख्य उद्देश्य देश के बच्चों को किसी भी प्रकार के यौन उत्पीड़न और शोषण से सुरक्षित रखना है और इस उद्देश्य से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता। हालांकि, कानून का दुरुपयोग रोकने के लिए निष्पक्ष न्याय प्रणाली का होना भी उतना ही आवश्यक है, जितना कि पीड़ितों को त्वरित न्याय दिलाना। सुप्रीम कोर्ट का यह ताजा फैसला इसी नाजुक संतुलन को बनाए रखने का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
इस फैसले के बाद पुलिस जांच एजेंसियों और अभियोजन विभागों पर भी यह दबाव बढ़ जाएगा कि वे कोर्ट में अपनी रिपोर्ट पेश करने से पहले हर एक सबूत की वैज्ञानिक और फोरेंसिक जांच पुख्ता तौर पर करें। कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश भारतीय न्याय व्यवस्था में एक नए युग की शुरुआत करता है, जहां भावनाओं या सतही अनुमानों के बजाय केवल और केवल ठोस सबूतों और सच्चाई के आधार पर ही अंतिम न्याय सुनिश्चित किया जाएगा।

