सिनेमा हॉल में खुले बाजार की तुलना में दोगुने से अधिक कीमत पर पानी की बोतल बेचना सिनेपोलिस (Cinepolis) और पेय पदार्थ बनाने वाली मशहूर कंपनी कोका-कोला (Coca-Cola) को भारी पड़ गया है। पटना जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए दोनों पर कुल 85,000 रुपये का जुर्माना लगाया है। आयोग ने इसे उपभोक्ताओं के अधिकारों का हनन और अनुचित व्यापार व्यवहार करार दिया है।
यह पूरा मामला लगभग एक दशक पुराना है, जिसकी शुरुआत सितंबर 2016 में हुई थी। पटना के सिनेपोलिस सिनेमा हॉल में फिल्म देखने गए एक दर्शक को प्यास लगने पर पानी की आवश्यकता हुई। आरोप था कि सिनेमाघर के अंदर उसे खुले बाजार में 20 रुपये मिलने वाली पैकेज्ड पानी की बोतल के लिए 50 रुपये चुकाने पड़े।
शिकायतकर्ता के अनुसार, सिनेमाघर के सुरक्षा गार्डों द्वारा बाहर से पीने का पानी या खाने-पीने की अन्य चीजें अंदर ले जाने पर सख्त पाबंदी थी। नियमों की इस बाध्यता के कारण उपभोक्ता को मजबूरन सिनेमा हॉल के अंदर तय एमआरपी (MRP) से ढाई गुना अधिक कीमत पर पानी खरीदना पड़ा था।
मामले की सुनवाई करते हुए जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष प्रेम रंजन मिश्र और सदस्य रजनीश कुमार की बेंच ने इसे गंभीर माना। आयोग ने स्पष्ट किया कि एक ही उत्पाद के लिए बाजार मूल्य से अलग मनमाने ढंग से दोहरी कीमत वसूलना और उपभोक्ताओं को बाहर से पानी लाने से रोकना ‘अनुचित एवं प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार’ की श्रेणी में आता है।
न्याय, मानसिक क्षति और मुकदमे के खर्च को ध्यान में रखते हुए आयोग ने कड़ा आर्थिक दंड तय किया। फैसले के तहत, सिनेमा हॉल और निर्माता कंपनी को संयुक्त रूप से पीड़ित उपभोक्ता को मानसिक क्षतिपूर्ति के रूप में 25,000 रुपये और मुकदमे के खर्च (वाद व्यय) के तौर पर 10,000 रुपये देने का निर्देश दिया गया है।
इसके अलावा, इस तरह की मनमानी पर रोक लगाने और कड़ा संदेश देने के लिए 50,000 रुपये की राशि राज्य उपभोक्ता कल्याण कोष में जमा करने का आदेश दिया गया है। इस प्रकार कुल मिलाकर 85,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया है।
उपभोक्ता आयोग ने अपने इस फैसले में यह भी चेतावनी दी है कि आदेश का पालन 45 दिनों के भीतर किया जाना अनिवार्य है। यदि तय सीमा के अंदर राशि का भुगतान नहीं किया जाता है, तो कुल निर्धारित राशि पर 9 प्रतिशत की दर से वार्षिक ब्याज भी वसूला जाएगा। इस ऐतिहासिक फैसले से मल्टीप्लेक्स और बड़ी कंपनियों द्वारा उपभोक्ताओं के हो रहे आर्थिक शोषण पर लगाम लगने की उम्मीद जगी है।

