सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण जारी किया है। अदालत ने साफ किया है कि “एसआईआर (SIR) प्रक्रिया समाप्त होने का यह कतई मतलब नहीं है कि मतदाता सूची हमेशा के लिए फ्रीज या स्थिर हो गई है।”
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई के दौरान इस बात पर जोर दिया कि ड्राफ्ट सूची से हटाए गए या किसी वजह से छूटे हुए पात्र नागरिकों के नाम आगे भी दोबारा जोड़े जा सकते हैं। अदालत के अनुसार, मतदाता सूची को पूरी तरह से पाबंद नहीं माना जा सकता, ताकि किसी भी वैध नागरिक का मताधिकार सुरक्षित रहे।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग (ECI) की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए। अदालत ने चिंता जताई कि एसआईआर प्रक्रिया के तहत बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम ‘शिफ्टेड’ (स्थानांतरित) या ‘एब्सेंट’ (अनुपस्थित) श्रेणी में डालकर ड्राफ्ट सूची से बाहर कर दिए गए हैं। कोर्ट ने पूछा कि केवल फॉर्म समय पर न जमा हो पाने या प्रशासनिक कमियों के कारण नागरिकों को उनके मताधिकार से कैसे वंचित किया जा सकता है।
अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि पहले से पंजीकृत मतदाताओं को, जिनके नाम सूची से हट गए हैं, उन्हें दोबारा नाम जुड़वाने के लिए ‘फॉर्म-6’ भरने के लिए क्यों मजबूर किया जा रहा है, जबकि यह फॉर्म आमतौर पर नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए होता है। बेंच ने स्पष्ट किया कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत अस्थायी रूप से कहीं और जाना ‘स्थायी रूप से शिफ्ट’ होना नहीं माना जा सकता।
शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने और सुधार करने की प्रक्रिया एक सतत (Continuous) प्रक्रिया है जो लगातार चलती रहती है। इसके लिए किसी एक कठोर कट-ऑफ तारीख या अंतिम समयसीमा पर अत्यधिक जोर नहीं दिया जाना चाहिए, जिससे पात्र लोग सूची से बाहर होने के डर में रहें।
इस मामले में चुनाव आयोग की ओर से पेश वकीलों ने भी दलीलें रखीं। वहीं, सुप्रीम कोर्ट के इस रुख को उन लाखों मतदाताओं के लिए एक बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है, जिनके नाम हालिया पुनरीक्षण अभियानों के दौरान सूची से बाहर हो गए थे।
फिलहाल, अदालत ने चुनाव आयोग को इन तमाम बिंदुओं और उठाई गई प्रशासनिक विसंगतियों पर विचार कर दो सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस स्पष्टीकरण से यह सुनिश्चित हो गया है कि तकनीकी और प्रशासनिक जटिलताओं के बावजूद नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा सर्वोपरि है।

