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    Home»अन्य»डिजिटल साक्ष्यों पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: सिर्फ व्हाट्सएप चैट के दम पर नहीं दी जा सकती सजा
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    डिजिटल साक्ष्यों पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: सिर्फ व्हाट्सएप चैट के दम पर नहीं दी जा सकती सजा

    Brijesh ChoudharyBy Brijesh ChoudharyOctober 24, 2026361 Views
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    हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल व्हाट्सएप चैट या संदेशों के आधार पर किसी व्यक्ति को हत्या के जुर्म में दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने यह टिप्पणी ‘कुसूमलाल साव बनाम छत्तीसगढ़ राज्य’ मामले की सुनवाई करते हुए की, जिसमें छत्तीसगढ़ के एक व्यक्ति को हत्या और सबूत मिटाने के आरोपों से बरी कर दिया गया।

    यह मामला छत्तीसगढ़ राज्य से जुड़ा हुआ है, जहां निचली अदालत और बाद में हाईकोर्ट ने आरोपी को हत्या के मामले में दोषी करार दिया था। निचली अदालतों के इस निर्णय के खिलाफ आरोपी पक्ष ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया था, जहां न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने इस पूरे मामले की गहन सुनवाई की।

    सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए व्हाट्सएप मैसेज कानूनन किसी भी व्यक्ति की सजा को बरकरार रखने के लिए पूरी तरह से अपर्याप्त और कमजोर साक्ष्य हैं। अदालत ने कहा कि जिन गवाहों की चैट का हवाला दिया गया था, उनमें से किसी ने भी अपनी आंखों से आरोपी को अपराध को अंजाम देते हुए नहीं देखा था।

    अदालत ने इन डिजिटल संदेशों को ‘सुने-सुनाए साक्ष्य’ (Hearsay Evidence) की श्रेणी में रखा। बेंच ने यह भी रेखांकित किया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि मृतक की मौत का सटीक समय क्या था, जिसकी वजह से यह स्थापित नहीं हो सका कि व्हाट्सएप चैट वास्तव में घटना के समय या उसके आसपास ही भेजी गई थीं।

    व्हाट्सएप चैट के अलावा, अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए अन्य भौतिक साक्ष्य भी अदालत की कसौटी पर खरे नहीं उतर पाए। जांच के दौरान घटनास्थल से कुछ खून के धब्बे बरामद किए गए थे, लेकिन अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि वे निशान वास्तव में मृतक के ही थे, क्योंकि कोई डीएनए प्रोफाइलिंग मैच नहीं मिल पाई थी।

    इसके साथ ही, हत्या में कथित रूप से इस्तेमाल किए गए हथियार जैसे लोहे की रॉड और पेचकस से जुड़े सबूत भी काफी कमजोर और संदेहास्पद पाए गए। इन सभी कमियों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत और हाईकोर्ट के फैसलों को खारिज कर दिया और आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

    यह फैसला आपराधिक न्याय प्रणाली में एक कड़ा संदेश देता है कि विशेषकर परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (Circumstantial Evidence) पर आधारित मामलों में, दोषसिद्ध करने के लिए केवल अनुमानों या चैट जैसे कमजोर डिजिटल प्रमाणों पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। अदालत के इस रुख से यह स्पष्ट हो गया है कि न्याय के लिए पुख्ता, अकाट्य और निर्विवाद सबूत होना अनिवार्य है।

    Brijesh Choudhary
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