छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने संतान प्राप्ति की आस लगाए एक दंपती के पक्ष में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल पति की उम्र अधिक होने के आधार पर पत्नी को आईवीएफ (टेस्ट ट्यूब बेबी) तकनीक के इलाज से वंचित नहीं किया जा सकता है। इस फैसले से उन तमाम असहाय दंपतियों को बड़ी कानूनी राहत मिली है जो उम्र की तकनीकी पेचीदगियों के कारण माता-पिता बनने के अधिकार से वंचित रह जाते थे।
यह पूरा मामला छत्तीसगढ़ के मनेंद्रगढ़ का है, जहां एक दंपती ने शादी के 22 साल बाद भी संतान सुख न मिलने पर आईवीएफ तकनीक के जरिए माता-पिता बनने का फैसला किया था। इसके लिए उन्होंने स्थानीय स्तर पर अधिकृत प्राधिकारी के पास आवेदन किया था, लेकिन पति की उम्र 57 वर्ष होने का हवाला देकर उनके आवेदन को खारिज कर दिया गया था।
अधिकारियों का तर्क था कि सहायक प्रजनन तकनीक (ART Act) के तहत पुरुषों के लिए ऊपरी आयु सीमा 55 वर्ष तय की गई है। हालांकि, इस मामले में पत्नी की उम्र लगभग 47 वर्ष थी, जो महिलाओं के लिए निर्धारित 50 वर्ष की कानूनी आयु सीमा के भीतर आती थी। पति की आयु अधिक होने के कारण प्रशासन ने उन्हें इस प्रक्रिया से रोक दिया था।
दंपती ने इस प्रशासनिक फैसले को चुनौती देते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उच्च न्यायालय ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि कानून में महिला और पुरुष के लिए अलग-अलग आयु सीमाएं जरूर तय की गई हैं, लेकिन इसमें पति-पत्नी की ‘संयुक्त आयु’ (Joint Age) या एक साथी की अयोग्यता के आधार पर दूसरे के अधिकार छीनने जैसी कोई बात स्पष्ट रूप से नहीं जोड़ी गई है।
अदालत ने अपने फैसले में इस बात पर जोर दिया कि प्रजनन संबंधी निर्णय लेना और अपने परिवार को आगे बढ़ाना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार’ का एक अहम हिस्सा है। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि कानून में जो शर्त विधायिका ने खुद नहीं रखी है, उसे प्रशासनिक स्तर पर जबरन नहीं थोपा जा सकता है।
इस महत्वपूर्ण निर्देश के तहत हाईकोर्ट ने पिछले खारिज आदेश को पूरी तरह से रद्द कर दिया और दंपती को सभी चिकित्सकीय एवं वैधानिक शर्तों को पूरा करते हुए आईवीएफ उपचार कराने की अनुमति दे दी। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि उपचार की लंबी प्रक्रिया के दौरान पत्नी की उम्र 50 वर्ष भी पार हो जाती है, तो केवल उम्र बढ़ने के कारण चल रहे इलाज को बीच में बंद नहीं किया जाएगा।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला देश भर के लिए एक मजबूत मिसाल पेश करता है। इससे पहले कलकत्ता और गुजरात हाईकोर्ट जैसे अन्य न्यायालयों ने भी ऐसे ही मामलों में यह व्यवस्था दी है कि यदि दंपती में से कम से कम एक जीवनसाथी अधिनियम के दायरे में आता है, तो उन्हें इस चिकित्सा तकनीक का लाभ मिलना चाहिए।
इस ऐतिहासिक न्यायिक निर्णय ने यह साबित कर दिया है कि प्रशासनिक नियम नागरिकों के मौलिक अधिकारों और पितृत्व की चाहत में रोड़ा नहीं बन सकते। इससे देश के अन्य मेडिकल बोर्ड और क्लीनिकों को भी एक स्पष्ट दिशा-निर्देश मिल गया है, जिससे भविष्य में ऐसे मामलों में अनावश्यक कानूनी अड़चनों से बचा जा सकेगा।

