हिंदू पंचांग और सनातन परंपराओं के अनुसार, पितृ पक्ष का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व होता है। साल 2026 में पितृ पक्ष के दौरान आज, यानी 4 अक्टूबर 2026 (रविवार) को ‘मातृ नवमी’ का पावन पर्व मनाया जा रहा है। इस तिथि को ‘अविधवा नवमी’ या ‘सौभाग्यवती श्राद्ध’ के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन परिवार की उन दिवंगत महिलाओं का श्राद्ध और तर्पण किया जाता है, जिनकी मृत्यु उनके पति के जीवित रहते यानी सुहागिन अवस्था में हुई हो।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मातृ नवमी का दिन परिवार की माताओं, दादियों, नानियों और अन्य कुल की सुहागिन महिलाओं के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने का सबसे बड़ा अवसर माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि इस तिथि पर विधि-विधान से पूजा और श्राद्ध करने से परिवार की दिवंगत महिलाओं की आत्मा को शांति मिलती है और उनका आशीर्वाद पूरे वंश पर सदा बना रहता है, जिससे घर में सुख-समृद्धि और शांति का वास होता है।
आज के इस विशेष अवसर पर श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण कर्म के लिए दोपहर के समय को सबसे उत्तम और फलदायी माना गया है। पंचांग के अनुसार, आज तर्पण के लिए प्रमुख मुहूर्त इस प्रकार हैं—कुतुप मुहूर्त सुबह 11:46 बजे से दोपहर 12:33 बजे तक, रौहिण मुहूर्त दोपहर 12:33 बजे से दोपहर 01:20 बजे तक, और अपराह्न काल दोपहर 01:20 बजे से दोपहर 03:42 बजे तक रहेगा। लोग अपनी सुविधा और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इन मुहूर्तों में अनुष्ठान संपन्न कर रहे हैं।
मातृ नवमी के दिन की पूजा पद्धति में प्रातकाल स्नान-ध्यान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करने का विधान है। इसके पश्चात दक्षिण दिशा की ओर मुख करके अपने पूर्वजों का स्मरण किया जाता है। तर्पण के लिए तांबे या कांसे के बर्तन में जल भरकर उसमें काले तिल, जौ, कुशा और सफेद फूल मिलाए जाते हैं, जिसके माध्यम से पितरों को जलावर्जन किया जाता है।
तर्पण के उपरांत दिवंगत आत्माओं की तृप्ति के लिए सात्विक भोजन तैयार किया जाता है, जिसमें खीर, पूरी और मौसमी सब्जियां प्रमुख रूप से शामिल होती हैं। इस भोजन का एक अंश अग्नि को समर्पित करने के बाद गाय, कुत्ते, कौवे और चींटियों के लिए निकाला जाता है, क्योंकि शास्त्रों में इन्हें पंच महाभूतों और पितरों का संदेशवाहक माना गया है।
मातृ नवमी की सबसे विशेष परंपरा यह है कि इस दिन सुहागिन महिलाओं की स्मृति में सौभाग्य की वस्तुएं दान की जाती हैं। व्रती या परिवार के लोग हरी या लाल चूड़ियां, सिंदूर, बिंदी, वस्त्र (साड़ी) और दक्षिणा किसी सुहागन ब्राह्मण महिला या जरूरतमंद को आदर सहित भेंट करते हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से मां लक्ष्मी और देवी अन्नपूर्णा की कृपा प्राप्त होती है और घर-परिवार में अखंड सौभाग्य बना रहता है।
आज मातृ नवमी के पावन पर्व पर देश भर के विभिन्न तीर्थ स्थलों, नदियों के घाटों और घरों में लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना कर रहे हैं। इस प्रकार, यह पर्व न केवल हमारी सनातन संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखने का माध्यम है, बल्कि अपनी पुरानी पीढ़ियों के प्रति सम्मान और प्रेम प्रकट करने का एक पवित्र अवसर भी है।

