ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे परमाणु गतिरोध में एक बार फिर नाटकीय मोड़ आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में एक सनसनीखेज दावा करते हुए कहा कि ईरान अपने समृद्ध यूरेनियम (Enriched Uranium) के भंडार को सौंपने के लिए तैयार हो गया है। ट्रंप के अनुसार, दोनों देश एक ऐतिहासिक समझौते के बेहद करीब हैं, जिससे लंबे समय से चले आ रहे प्रतिबंधों और तनाव का अंत हो सकता है।
राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने बयान में काफी उत्साह दिखाया और इसे अपनी कूटनीतिक जीत के रूप में पेश किया। उन्होंने संकेत दिया कि यदि यह समझौता सिरे चढ़ता है, तो न केवल वैश्विक तेल बाजार में स्थिरता आएगी, बल्कि होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण व्यापारिक रास्तों पर भी तनाव कम होगा। ट्रंप का मानना है कि उनकी सख्त दबाव की नीति काम कर रही है और ईरान अब बातचीत की मेज पर आने को मजबूर है।
हालांकि, तेहरान से आ रही खबरें ट्रंप के दावों के बिल्कुल विपरीत हैं। ईरानी विदेश मंत्रालय ने एक आधिकारिक बयान जारी कर इन खबरों को ‘भ्रामक’ बताया है। तेहरान ने स्पष्ट किया है कि उन्होंने किसी भी ऐसे समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं जिसमें यूरेनियम का भंडार सौंपने की शर्त शामिल हो। ईरान का कहना है कि वह अपने परमाणु संवर्धन के अधिकार को एक संप्रभु अधिकार मानता है और इसे अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में जारी रखेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस विवाद की असली जड़ परमाणु संवर्धन पर लगने वाली ‘समय सीमा’ है। अमेरिका चाहता है कि ईरान कम से कम 20 वर्षों तक अपने परमाणु कार्यक्रम पर कड़ा प्रतिबंध लगाए, जबकि ईरान केवल 3 से 5 वर्षों की अल्पावधि के लिए ही सहमत होना चाहता है। यही वह मुख्य बिंदु है जहाँ आकर दोनों देशों के बीच की बातचीत हर बार अटक जाती है।
ईरान के इस सख्त रुख के पीछे उसकी घरेलू राजनीति और सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी हैं। तेहरान को डर है कि यदि उसने पूरी तरह से अपने परमाणु भंडार को सौंप दिया, तो वह क्षेत्र में रणनीतिक रूप से कमजोर हो जाएगा। इसके अलावा, ईरानी नेतृत्व का मानना है कि जब तक अमेरिका सभी आर्थिक प्रतिबंधों को स्थायी रूप से नहीं हटाता, तब तक किसी भी तरह का बड़ा समझौता करना उनके लिए जोखिम भरा होगा।
वर्तमान में स्थिति यह है कि दोनों देशों के बीच सूचनाओं का युद्ध (Information War) छिड़ गया है। एक तरफ ट्रंप प्रशासन इसे दुनिया के सामने एक बड़ी सफलता के रूप में प्रदर्शित कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ तेहरान किसी भी दबाव में झुकने से इनकार कर रहा है। आने वाले कुछ सप्ताह अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे, क्योंकि यह स्पष्ट होगा कि क्या वाकई में पर्दे के पीछे कोई सहमति बनी है या यह केवल राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा है।

